7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 165

150 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पर विचार करने के लिए विद्वान ब्राह्मण की नियुक्ति करनी चाहिए।

8.10. ऐसा व्यक्ति उस श्रेष्ठतम न्यायालय में तीन निर्धारकों के साथ आएगा और

राजा के सम्मुख समस्त कारणों पर, बैठकर या खड़े होकर, पूर्ण विवेचन करेगा।

अन्य विशेषाधिकार आर्थिक थेः

8.37. जब किसी विद्वान ब्राह्मण को कोई निधि मिल गई हो और उसने उसे उसी

भांति जमा कर दिया हो, तब वह उस संपूर्ण निधि को ले सकता है, क्योंकि वह

प्रत्येक वस्तु का स्वामी है।

8.38. जब राजा को भूमि में गड़ी कोई पुरानी निधि मिल जाए, तब उसे उसका

आधा भाग ब्राह्मणों को दे देना चाहिए। और शेष आधा भाग अपने राजकोष में

जमा कर देना चाहिए।

9.323. परंतु (जो राजा यह अनुभव करता है कि उसका अंत निकट आ रहा है)

उसे अपना समस्त धन, जो दंड आदि से एकत्र हुआ हो, ब्राह्मणों को दान कर

देना चाहिए, अपना राज्य अपने पुत्र को सौंप देना चाहिए और युद्ध क्षेत्र में वीर

गति प्राप्त करनी चाहिए।

9.187. मृतक की संपदा सपिंड को मिलेगी जो तीन पीढि़यों में आता हो और

दिवंगत के सबसे निकट हो, इसके बाद उसका एक भाग (उत्तराधिकारी को,

उसके बाद) आध्यात्मिक गुरु या शिष्य को मिलेगा।

9.188. परंतु किसी भी उत्तराधिकारी के न होने पर, ऐसे ब्राह्मण उसे आपस में

बांट लेंगे जो तीनों वेदों में पारंगत हों, पवित्र और संयमी हों, इस प्रकार विधि

का उल्लंघन नहीं होता है।

9.189. ब्राह्मण की संपत्ति राजा द्वारा कभी भी नहीं ली जानी चाहिए, यह एक

निश्चित नियम है, लेकिन अन्य जाति के व्यक्तियों की संपत्ति उनके उत्तराधिकारियों

के न रहने पर राजा ले सकता है।

ये वे सुविधाएं, रियायतें और विशेषाधिकार हैं, जो मनु ने ब्राह्मणों को दिए। ये इस बात के प्रतीक हैं कि ब्राह्मण किस प्रकार राजा बन जाता है।

ब्राह्मणवाद के समर्थक - ब्राह्मणवाद की श्रेष्ठता में उनका इतना दृढ़ विश्वास है कि अभी तक कोई व्यक्ति उसका समर्थन तर्क द्वारा करने के लिए तैयार नहीं है - उन प्रतिबंधों का उल्लेख करने से नहीं अघाते जो मनु ने ब्राह्मणों पर आरोपित किए हैं। ऐसा करने में उनका उद्देश्य यह प्रदर्शित करना है कि मनु ने ब्राह्मणों के लिए निर्धनता और सेवा-भावना का आदर्श निश्चित किया था। यह सत्य है कि मनु ने ब्राह्मणों के लिए