ब्राह्मणवाद की विजय
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कुछ सीमाएं निश्चित की हैं। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना अनुचित होगा और तथ्यों को सोद्देश्य तोड़ना-मरोड़ना होगा, जिसके लिए मनुस्मृति में कोई आधार भी नहीं है कि ब्राह्मणों के लिए मनु का आदर्श उसकी निर्धनता और सेवा-भावना है।
यह समझने के लिए कि मनु ने ये सीमाएं ब्राह्मणों के लिए क्यों निश्चित कीं, हमें दो बातें ध्यान में रखनी चाहिएं। पहली बात वह स्थान है, जो मनु ने समाज की सामान्य योजना में ब्राह्मणों के लिए निश्चित किया है, और दूसरी बात इन सीमाओं की प्रकृति है। मनु ने जो स्थान निश्चित किया है, उसकी विवेचना उसने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में की है। चूंकि यह विषय महत्त्वपूर्ण है, इसलिए मैं उन श्लोकों को पुनः उद्धृत कर रहा हूं, जिन्हें मैं पहले उद्धृत कर चुका हूंः
1.93. ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने के कारण, ज्येष्ठ होने से, वेद के धारण करने
से धर्मानुसार ब्राह्मण ही संपूर्ण सृष्टि का स्वामी होता है।
इस सीमा की प्रकृति पर विचार कीजिए।
4.2. ब्राह्मण विपत्ति के समय को छोड़कर शेष समय में अपनी आजीविका इस
प्रकार ग्रहण करें कि जिसके कारण अन्य लोगों को कोई पीड़ा न हो या अत्यल्प
पीड़ा हो।
4.3. मात्र आजीविका प्राप्त करने के लिए, वह अपने शरीर को अनुचित रूप से
कष्ट न देकर ऐसे अनिंदनीय व्यवसायों का अनुसरण कर धन का संग्रह करें, जो
उसकी जाति के लिए निर्धारित हैं।
8.337. चोरी करने पर शूद्र को आठ गुना, वैश्य को सोलह गुना और क्षत्रिय को
बत्तीस गुना पाप होता है।
8.338. ब्राह्मण को चौंसठ गुना या एक सौ गुना या एक सौ अट्ठाईस गुना तक,
इनमें से प्रत्येक को अपराध की प्रकृति की जानकारी होती है।
8.383. उन दोनों जातियों की रक्षित स्त्रियों के साथ संभोग करने पर ब्राह्मण एक
सहस्त्र पण दंड के रूप में देने के लिए बाध्य किया जाएगा, रक्षित शूद्र स्त्री के साथ
संभोग करने पर क्षत्रिय या वैश्य को एक सहस्त्र पण का दंड दिया जाएगा।
8.384. अरक्षित क्षत्रिय स्त्री के साथ संभोग करने पर वैश्य को पांच सौ पण का
दंड दिया जाएगा, लेकिन इसी प्रकार अपराध करने पर क्षत्रिय का सिर गधे के
पेशाब से मुंडवाया जाएगा या उतना ही (पांच सौ पण) का दंड दिया जाएगा।
8.385. जो ब्राह्मण क्षत्रिय या वैश्य जाति की अरक्षित स्त्रियों या शूद्र जाति की
स्त्री के साथ संभोग करता है, उसे पांच सौ पण का, लेकिन सबसे नीची जाति