152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अर्थात् अन्त्यज की स्त्री के साथ संभोग करने पर एक हजार पण का दंड दिया
जाएगा।
मनु द्वारा ब्राह्मण को जो स्थान दिया गया है, उसके परिप्रेक्ष्य में इन सीमाओं का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि इन सीमाओं का उद्देश्य यह नहीं था कि ब्राह्मण हानिकर स्थिति में रहे, बल्कि इससे तो यह स्पष्ट होता है कि मनु का उद्देश्य ब्राह्मण को उस उच्च पद से भ्रष्ट होने से बचाना था, जहां उसने उसे प्रतिष्ठित किया और उसका उद्देश्य उसे गैर-ब्राह्मणों से निंदित होने से बचाना था।
मनुस्मृति में दी गई अन्य व्यवस्थाओं से यह स्पष्ट होता है कि मनु का उद्देश्य ब्राह्मणों को दीनता और अभाव की स्थिति में रखना नहीं था। इस संबंध में मनुस्मृति में दिए गए आचरण संबंधी उन नियमों पर ध्यान देना होगा, जिनका ब्राह्मण को उस समय पालन करना चाहिए, जब वह विपत्ति में हो।
10.80. जितने भी व्यवसाय हैं, उनमें ब्राह्मणों के लिए वेद का अध्यापन, क्षत्रिय
के लिए लोगों की रक्षा करना और वैश्य के लिए व्यापार सर्वश्रेष्ठ व्यवसाय है।
10.81. लेकिन यदि ब्राह्मण अपने उस व्यवसाय से, जिसका अभी उल्लेख किया
गया है, जीवन-निर्वाह नहीं कर सके, तब क्षत्रिय के लिए निर्दिष्ट व्यवसाय को
अपनाकर जीवन-निर्वाह करे, क्योंकि वह पद के अनुसार उसके बाद आता है।
10.82. यदि यह पूछा जाए, ‘अगर वह इन दोनों व्यवसायों में से किसी भी एक
व्यवसाय से अपना जीवन-निर्वाह नहीं कर सके, तब क्या किया जाए?’ उत्तर है,
वह वैश्य की जीवन-पद्धति अपना ले, स्वयं खेती करे और पशुपालन करे।
10.83. परंतु जो ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय वैश्य की जीवन-पद्धति के अनुसार
जीवन-यापन करता है, उसे सावधानी से कृषि कार्य से विरत रहना चाहिए, जिसमें
अनेक जीवों की हिंसा होती है और जो दूसरों पर निर्भर करता है।
10.84. कुछ लोग कृषि को उत्तम कर्म कहते हैं, किंतु परोपकारी व्यक्ति जीविका
के इस साधन को हेय कहते हैं, क्योंकि लोहे के मुख लगा लकड़ी का उपकरण
भूमि और उसमें रहने वाले जीवों को क्षति पहुंचाता है।
10.85. लेकिन जो व्यक्ति जीविका के उत्तम साधनों के अभाव में उचित व्यवसायों
को नहीं अपना सकता है, वह उन वस्तुओं की बिक्री कर धन अर्जित कर सकता
है, जो व्यापारी बेचते हैं। लेकिन इनमें निम्नलिखित वस्तुओं को शामिल न करे।
यहां ध्यान देने की बात यह है कि जो सीमाएं ब्राह्मण पर आरोपित की गईं, वह तभी तक रहती हैं जब तक वह अपने उन व्यवसायों से फलता-फूलता रहता है, जो किसी अधिकार के कारण उसके अपने हैं। ज्यों ही वह अपने लिए आरक्षित व्यवसाय