7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 168

ब्राह्मणवाद की विजय

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के साथ-साथ जो भी उसे पसंद हो, वैसा हर प्रकार का कर्म करने के लिए स्वतंत्र है और वह ब्राह्मण भी बना रहता है। इसके अलावा यह निर्णय करना भी ब्राह्मण के अपने विवेक पर छोड़ दिया गया है कि वह विपत्तिग्रस्त है अथवा नहीं। इस प्रकार संपत्तिवान ब्राह्मण तक पर कोई रोक नहीं है कि वह अपने विवेक के आधार पर किसी भी परिस्थिति को विपत्ति कह किसी भी व्यवसाय को चुनकर, जो उसके लिए खुला है, अपनी आय में वृद्धि न कर सके।

मनुस्मृति में और भी व्यवस्थाएं हैं, जिनका उद्देश्य ब्राह्मणों को भौतिक दृष्टि से समृद्ध बनाना है। ये हैं, दक्षिणा और दान। दक्षिणा वह शुल्क है, जो कोई ब्राह्मण तब लेने का अधिकारी होता है, जब उसे धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए बुलाया जाता है। ब्राह्मण धर्म में अनेक धार्मिक रीति और अनुष्ठान वर्णित हैं। हम इस बात का सहज अनुमान लगा सकते हैं कि यह प्रत्येक ब्राह्मण के लिए आय का कितना बड़ा स्रोत रहा होगा। शायद ही कोई ऐसा अवसर आता हो जब पुजारी को उसका शुल्क न दिया जाता हो। दक्षिणा के बारे में धार्मिक भावना उसके अनिवार्य रूप से दिए जाने का पर्याप्त कारण थी। लेकिन मनु ब्राह्मण को उसे अपना शुल्क लेने का अधिकार देना चाहता था।

11.38. जो ब्राह्मण संपत्तिशाली होने पर भी प्रजापति को अग्न्याधेय का अनुष्ठान

करने पर शुल्क के रूप में पवित्र अश्व नहीं देता है, वह ऐसे व्यक्ति के समान

है जिसने अग्निहोत्र नहीं किया है।

11.39. जो व्यक्ति श्रद्धालु है, जिसे अपनी इंद्रियों पर संयम है, उसे अन्य पुण्य

कार्य करने चाहिए, लेकिन उसे किसी भी दशा में ऐसे यज्ञ नहीं करने चाहिए,

जिसमें वह (शास्त्र-सम्मत शुल्क से) कम दक्षिणा दे।

11.40. जिस यज्ञ में बहुत थोड़ी दक्षिणा दी गई हो, ऐसा यज्ञ इंद्रिय, प्रतिष्ठा,

स्वर्ग-सुख, दीर्घ आयु, यश, संतान और पशुधन को नष्ट कर देता है, अतः थोड़ा

धन वाले व्यक्ति को (श्रौत) यज्ञ नहीं करना चाहिए।

वह यह घोषित कर ब्राह्मण को इस सीमा तक क्षमा कर देता है कि अगर अपनी दक्षिणा प्राप्त करने के लिए वह कुछ भी अपराध करता है तो वह धर्म के अनुसार दंड का भागी नहीं होता।

8.349. जो व्यक्ति आत्मरक्षा के लिए पूजा करने वाले पुजारी को उसकी दक्षिणा

दिलाने, स्त्रियों और ब्राह्मणों की रक्षा करने जैसी परिस्थितियों में धर्म के निमित्त

किसी की हत्या करता है, तो वह कोई पाप नहीं करता।

लेकिन दान का विधान ऐसा विधान है, जो ब्राह्मणों के लिए आय का प्रचुर स्रोत है। मनु राजा को ब्राह्मणों को दान देने के लिए प्रेरित करता है।