7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 170

ब्राह्मणवाद की विजय

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है, यात्री को, उसे जिसने अपनी सारी संपत्ति दे दी है, उसे जो अपने गुरु, अपने

पिता, अपनी माता के लिए भिक्षा मांगता है, वेद के विद्यार्थी को और रोगी को।

11.2. इन नौ ब्राह्मणों को स्नातक समझना चाहिए जो धर्म के अनुसार पवित्र

कर्म करने के लिए भिक्षा लेते हैं, ऐसी इन निर्धन व्यक्तियों को उनकी विद्या के

अनुसार दान देना चाहिए।

11.3. द्विजों में इन सर्वश्रेष्ठ द्विज को अन्न और धन का दान देना चाहिए, यह

घोषित किया जाता है कि अन्य लोगों को यज्ञ वेदी के बाहर अन्न दिया जाना

चाहिए।

11.6. वेद में निष्णात और अकेले रहने वाले ब्राह्मणों को अपनी क्षमता के

अनुसार धन देना चाहिए। इस प्रकार वह व्यक्ति मृत्यु के बाद स्वर्ग का आनंद

भोगता है।

मनु ने दान देने का नियम बनाया। यह निस्संदेह आय का सुरक्षित और स्थाई स्रोत बन गया, जो बहुत ही स्पष्ट है। मनु ने दान को प्रायश्चित से जोड़ दिया। मनु की व्यवस्था में कोई भी अनुचित कार्य पाप हो सकता है, भले ही वह कोई अपराध न हो, या यह पाप और अपराध, दोनों हो सकता है। पाप के रूप में उसका दंड धर्मनिरपेक्ष कानून का विषय है। पाप के रूप में, वह अनुचित कार्य पातक कहा जाता है और इसके लिए जो दंड है, उसे प्रायश्चित कहते हैं। मनु की व्यवस्था में प्रत्येक पातक कर्म से प्रायश्चित का कर्म कर, मुक्त हुआ जा सकता है।

11.44. जो कोई व्यक्ति निर्धारित कार्य नहीं करता या निंदनीय कार्य करता है या

ऐन्द्रिक सुखोपभोग में लीन रहता है, उसे प्रायश्चित करना चाहिए।

11.45. (सभी) ऋषि अज्ञान से किए गए कार्य के लिए प्रायश्चित का विधान

करते हैं, कुछ उपलब्ध पाठ के साक्ष्य के आधार पर यह कहते हैं कि यह सोद्देश्य

किए गए अपराधों के लिए किया जाए।

11.46. जो पाप अज्ञान से किया जाता है, वह वेद की ऋचाओं का पाठ करने से

दूर हो जाता है। लेकिन जो पाप (लोग) अपनी मूर्खतावश सोद्देश्य करते हैं, वह

विभिन्न प्रकार के (विशेष) प्रायश्चित कर्म कर दूर किया जा सकता है।

11.52. इस प्रकार पूर्व जन्म के बचे हुए दुष्कृत्यों के कारण मूर्ख, गूंगे, अंधे,

बहरे और विकृत अंगों वाले मनुष्य पैदा होते हैं, जो गुणीजनों के द्वारा हेय समझे

जाते हैं।

11.53. इसलिए शुद्धि के लिए प्रायश्चित अवश्य करना चाहिए, क्योंकि जिनके