7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 171

156 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पाप दूर नहीं होते हैं, वे अशोभनीय चिर्िं लिए (पुनः) जन्म लेते हैं।

मनु ने अनेक प्रकार के प्रायश्चित निर्धारित किए हैं। जिज्ञासु लोग यह जानने के लिए कि ये प्रायश्चित क्या हैं, मनुस्मृति देख सकते हैं। इन प्रायश्चितों के बारे में जो बात ध्यान देने की है, वह यह है कि इन प्रायश्चितों का कुछ इस प्रकार विधान किया गया है, जिससे ब्राह्मण को भौतिक लाभ हो। कुछेक प्रायश्चित का रूप ब्राह्मण को दान देना मात्र है। अन्य में कुछ धार्मिक कृत्य किए जाने का विधान है। लेकिन चूंकि धार्मिक कृत्य ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य के द्वारा नहीं किए जा सकते और धार्मिक कृत्य के लिए शुल्क देना होता है, अतः दान की प्रथा से केवल ब्राह्मण को ही लाभ होता है।

अतः यह कहना निरर्थक बात होगी कि मनु ब्राह्मणों के सम्मुख विनम्रता, दीनता, सेवा का आदर्श प्रस्तुत करना चाहता था। ब्राह्मणों ने मनु को इस रूप में ग्रहण नहीं किया। निश्चय ही उनका यह विश्वास था कि उन्हें एक विशेष दर्जा दिया जा रहा है। उन्हें इसमें विश्वास ही नहीं था, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी उन्होंने अपने विशेषाधिकार समझे, जिनके बारे में बाद में चर्चा की जाएगी। उनका जो दृष्टिकोण था, उसमें वह पूरी तरह सही थे। मनु ने ब्राह्मणों को ‘प्रभु’ कहा है और (नियम) इतनी सावधानीपूर्वक बनाए कि वे सदा इसी रूप में बने रहे।

ब्राह्मण-शासन और ब्राह्मण-प्रभुता के लिए पूरी व्यवस्था करने के बाद मनु ने समाज को बदलने का विधान किया, जिससे उसका उद्देश्य पूरा हो सके।

ब्राह्मणवाद अपनी विजय के बाद मुख्य रूप से जिस कार्य में जुट गया, वह था वर्ण को जाति में बदलने का कार्य, जो बड़ा ही विशाल और स्वार्थपूर्ण था। हमारे पास उन उपायों के बारे में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है, जो ब्राह्मणवाद ने इस प्रकार के परिवर्तन को लाने के लिए किए। इसके बजाए ‘वर्ण’ और ‘जाति’ के बीच के संबंध के बारे में कुछ भ्रांत विचारधाराएं हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि वर्ण और जाति एक ही बात है। जो लोग इन्हें अलग-अलग समझते हैं, उनका यह विश्वास है कि जब सामाजिक व्यवस्था में अंतर्विवाह निषिद्ध समझा जाने लगा, तब वर्ण जाति बन गया। वस्तुतः यह सब गलत है और यहां गलती इस तथ्य में है कि वर्ण को जाति में बदलते समय मनु ने अपने उद्देश्य की कहीं भी व्याख्या नहीं की और न यही स्पष्ट किया कि उसके साधन उन उद्देश्यों के साथ किस प्रकार संबद्ध हैं। ऑस्कर वाइल्ड का कहना है कि इसे समझने के लिए खोज करनी आवश्यक है। मनु किसी की पकड़ में नहीं आना चाहता था। इसलिए वह अपने लक्ष्यों और साधनों के विषय में मौन है। वह यह काम लोगों के लिए छोड़ देता है कि वह इनके बारे में अनुमान करें। हिंदुओं के लिए यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसे स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है, जिससे मनु की योजना के बारे में विभिन्न व्यक्तियों के अनुमानों के कारण उत्पन्न भ्रांतियों को दूर किया जा सके और यह स्पष्ट