7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 172

ब्राह्मणवाद की विजय

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किया जा सके कि ब्राह्मणवाद ने समाज के आधार के रूप में वर्ण की मूल संकल्पना को किस प्रकार गलत और घातक स्वरूप दे दिया।

जैसा कि मैंने कहा है, मनु ने जो उपाय अपनाए, उन्हें उसने व्यक्त नहीं होने दिया, उन्हें प्रच्छन्न रखा। इसलिए हम जाति के रूप में वर्ण के इस परिवर्तन का ब्यौरेवार और तिथिक्रम से विवरण नहीं दे सकते। लेकिन सौभाग्य से कुछ ऐसे संकेत उपलब्ध हैं, जिनसे इस बात की पर्याप्त रूप से स्पष्ट जानकारी मिलती है कि यह परिवर्तन किस प्रकार किया गया।

यह बताने से पहले कि यह परिवर्तन किस प्रकार किया गया, मैं उस भ्रांति को स्पष्ट करना चाहता हूं जो लोगों के दिमाग में वर्ण और जाति को लेकर फैली हुई है। इसे दूर करने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि हम इन दोनों के बीच समान तत्वों और विषमताओं पर गौर करें। वर्ण और जाति कानूनी अर्थ में एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। दोनों का अभिप्राय पद और व्यवसाय से है। पद और व्यवसाय, दो ऐसी अवधारणाएं हैं जो वर्ण और जाति, दोनों की धारणाओं में सन्निहित हैं। लेकिन वर्ण और जाति, दोनों का एक विशेष महत्व है जिसके कारण दोनों एक-दूसरे से भिन्न हैं। वर्ण तो पद या व्यवसाय किसी भी दृष्टि से वंशानुगत नहीं है। दूसरी ओर, जाति में एक ऐसी व्यवस्था निहित है जिसमें पद और व्यवसाय, दोनों ही वंशानुगत हैं और इसे पुत्र अपने पिता से ग्रहण करता है।

जब मैं यह कहता हूं कि ब्राह्मणवाद ने वर्ण को जाति में बदल दिया, तब मेरा आशय यह है कि इसने पद और व्यवसाय को वंशानुगत बना दिया।

यह परिवर्तन किस प्रकार किया गया? जैसा मैंने कहा, कि इस परिवर्तन को करने के लिए ब्राह्मणवाद ने जो उपाय किए, उनके कोई पदचिर्िं उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन ऐसे संकेत हैं जो हमें इसका स्पष्ट चित्र देते हैं कि यह योजना किस प्रकार कार्यान्वित की गई।

यह परिवर्तन विभिन्न चरणों में संपन्न किया गया। जाति के रूप में वर्ण के रूपांतरण में तीन चरण तो बिल्कुल स्पष्ट हैं। पहला चरण तो यह था जब व्यक्ति का वर्ण, अर्थात् पद और व्यवसाय केवल निर्धारित अवधि के लिए होता था। दूसरा चरण वह था कि जब किसी व्यक्ति के वर्ण में निहित पद और व्यवसाय केवल उसके जीवन-काल तक सुनिश्चित रहा। तीसरा चरण वह था जब वर्ण का पद और व्यवसाय वंशानुगत हो गया। कानून की शब्दावली में कहा जाए तो यह कि वर्ण द्वारा प्रदत्त संपदा शुरू में केवल किसी एक अवधि के लिए थी। इसके बाद यह जीवन-भर के लिए ही बनी और अंत में यही संपदा वंशानुगत बन गई। इस प्रकार वर्ण जाति में परिवर्तित हो गए। ऐसा प्रतीत होता है कि इस बात की पुष्टि के लिए परंपरा के आधार पर पर्याप्त प्रमाण हैं, जिसका उल्लेख धार्मिक साहित्य ख्1, में हुआ है कि वर्ण जिन अवस्थाओं में से होकर जाति बने, वह यही