7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 180

ब्राह्मणवाद की विजय

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यदि वह उससे संतान उत्पन्न करता है, तो वह ब्राह्मणत्व से भ्रष्ट हो जाता है।

3.18. जो व्यक्ति मुख्यतः (शूद्र पत्नी की) सहायता से देव-कार्य या पितृ-कार्य और अतिथि भोजनादि करता है, उसके हव्य और कव्य को क्रमशः देवता और पितर स्वीकार नहीं करते और ऐसा व्यक्ति स्वर्ग को नहीं प्राप्त करता।

3.19. जो व्यक्ति शूद्र स्त्री का अधर पान करता है, जो उसके श्वास से दूषित होता है और जो उससे संतान उत्पन्न करता है, उसकी किसी प्रायश्चित से शुद्धि नहीं हो सकती।

ब्राह्मणवाद अंतर्विवाह का निषेध कर संतुष्ट नहीं हुआ। उसने इससे आगे सहभोज का भी निषेध किया।

मनु ने भोजन करने के बारे में कुछ आरोप लगाए हैं। कुछ स्वास्थ्य संबंधी हैं, कुछ सामाजिक हैं। जो सामाजिक हैं, उनमें से निम्नलिखित ध्यान देने योग्य हैंः

4.218. राजा के द्वारा दिया गया भोजन उसके तेज को नष्ट करता है, शूद्र वर्ग के द्वारा दिया गया भोजन उसके ब्रह्म वर्चस्व को, सुनार के द्वारा दिया गया भोजन उसके जीवन को और चर्मकार के द्वारा दिया गया भोजन उसके यश को नष्ट करता है।

4.219. रसोइया या इस प्रकार के शूद्र शिल्पियों के द्वारा दिया गया भोजन उसकी संतति को और धोबी के द्वारा दिया भोजन शारीरिक बल को नष्ट करता है।

4.221. अन्य के द्वारा दिया गया भोजन, जिनका उल्लेख क्रम से किया गया है, कभी भी ग्रहण नहीं करना चाहिए, उनके अन्न को बुद्धिमान चमड़े, ह्यस्त्री और सिर के बाल कहते हैं।

4.222. यदि इस प्रकार के व्यक्तियों में से किसी का भी अन्न अज्ञानपूर्वक ग्रहण कर लिया गया है, तब तीन दिन का उपवास करना चाहिए, लेकिन यदि ज्ञानपूर्वक ग्रहण कर लिया हो, तब उसे वैसा ही कृच्छव्रत करना चाहिए, मानो उसने शुक्र मल और मूत्र ग्रहण कर लिया हो।

मैंने यह कहा है कि ब्राह्मणवाद ने अंतर्विवाह और सहभोज पर रोक लगाने का काम पशु की तरह नृशंस होकर किया। यदि किसी को उसमें संदेह हो, तो अनुरोध है कि मनु की भाषा पर विचार करना चाहिए। शूद्र स्त्री के संबंध में मनु जो घृणा व्यक्त करता है, उस पर ध्यान दीजिए। शूद्र के भोजन के बारे में मनु जो-कुछ कहता है, कहता है, उस पर ध्यान दीजिए। वह कहता है कि वह अशुद्ध है, जैसे शुक्र या मूत्र।

इन दो नियमों ने जातिप्रथा को जन्म दिया। अंतर्विवाह और सहभोज का निषेध दो स्तंभ हैं, जिन पर जातिप्रथा टिकी हुई है। जातिप्रथा और अंतर्विवाह तथा सहभोज से