166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
संबंधित नियम एक-दूसरे से ऐसे जुड़े हुए हैं, जैसे उद्देश्य के साथ उसको पूरा करने वाले उपाय। निश्चय ही यह उद्देश्य किन्हीं अन्य उपायों द्वारा पूरे नहीं किए जा सकते थे।
इन उपायों की योजना से यह स्पष्ट होता है कि ब्राह्मणवाद का उद्देश्य जातिप्रथा को जन्म देना था और यही उसका अंतिम लक्ष्य था। ब्राह्मणवाद ने अंतर्विवाह और सहभोज के विरूद्ध निषेध के नियम बनाए। लेकिन, बा्रह्मणवाद सामाजिक व्यवस्था में अन्य परिवर्तनों का भी सूत्रपात किया। अगर इन परिवर्तनों का प्रयोजन वही था जिनकी संभावना की मैंने अभी चर्चा की है, तब इस तथ्य को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि ब्राह्मणवाद जातिप्रथा को कायम रखने के बारे में इतना अधिक आतुर था कि इसने इसके लिए प्रयुक्त साधनों के उचित या अनुचित, नैतिक या अनैतिक होने की कोई परवाह नहीं की। मैं लड़कियों के विवाह और विधवाओं के जीवन के संबंध में मनुस्मृति में उल्लिखित नियमों की ओर ध्यान दिला रहा हूं। स्त्रियों के विवाह के संबंध में मनु जो नियम बनाता है, उन्हें देखिएः
9.4. वह पिता दोषी है जो उचित समय आने पर (अपनी पुत्री को) विवाह में
नहीं देता है।
9.88. पिता, समान जाति के श्रेष्ठ और सुंदर वर को अपनी पुत्री, चाहे उसकी आयु
उचित न भी हो, अर्थात् वह ऋतुमती न हुई हो, निर्धारित विधि के अनुसार दे।
इस नियम के अनुसार मनु यह निर्देश देता कि चाहे कोई लड़की गर्भ-धारण करने योग्य न हुई हो, अर्थात् चाहे वह बच्ची ही हो, तब भी उसका विवाह कर देना चाहिए। विधवाओं के संबंध में मनु निम्नलिखित नियम घोषित करता हैः
5.157. वह (अर्थात् विधवा) अपने सुख के लिए स्वेच्छापूर्वक शुद्ध पुष्पों, कंदमूल
और फलों का आहार कर अपने शरीर को क्षीण कर ले, लेकिन वह अपने पति
के निधन के बाद किसी दूसरे पुरुष का नाम भी न ले।
5.161. परंतु जो विधवा संतानोत्पत्ति की इच्छा से दुबारा विवाह कर अपने दिवंगत
पति का अनादर करती है, वह इस लोक में निंदा का पात्र बनती है और वह
(स्वर्ग में) अपने पति के सामीप्य से वंचित रहेगी।
5.162. पति के अतिरिक्त किसी दूसरे पुरुष से उत्पन्न स्त्री की संतान उसकी
संतान नहीं कहलाती, पत्नी के अतिरिक्त किसी दूसरी स्त्री से उत्पन्न किसी पुरुष
की संतान उसकी नहीं कहलाती, पतिव्रता स्त्री का दूसरा पति कहीं भी नहीं
निर्धारित है।