ब्राह्मणवाद की विजय
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स्त्री के लिए यह आरोपित वैधव्य के नियम हैं। यहां सती या उस विधवा के संबंध में चर्चा कर ली जाए जो अपने पति की चिता पर स्वयं को भस्म कर देती है और अपने जीवन का अंत कर देती है। मनु इस संबंध में मौन है।
याज्ञवल्क्य ख्1, नामक विद्वान जो मनु जितना ही महान है, कहता है कि स्त्री को अलग या अकेले नहीं रहना चाहिए।
- जब किसी स्त्री का पति दिवंगत हो जाए, तब वह अपने पिता, मां, पुत्र,
भाई, सास या अपने मामा से अलग न रहे, अन्यथा वह निंदा की पात्र बन सकती
है।
यहां याज्ञवल्क्य यह नहीं कहता कि विधवा को सती हो जाना चाहिए लेकिन याज्ञवल्क्य स्मृति की टीका मिताक्षरा के लेखक प्रज्ञानेश्वर उक्त श्लोक की टीका करते हुए निम्नलिखित मत व्यक्त करते हैंः ‘यह विष्णु ख्2, के पाठ के अनुसार विकल्प के रूप में ब्रह्मचर्य का जीवनयापन करने की स्थिति में होता है। पति की मृत्यु के बाद या तो ब्रह्मचर्य या उसके साथ चिंता में बैठना। प्रज्ञानेश्वर ख्3, इसमें अपना मत जोड़ते हैं कि उसके बाद चिता में बैठने का बड़ा महत्व है।
इससे कोई भी बड़ी सरलता और स्पष्टतापूर्वक यह जान सकता है कि सती होने का नियम किस प्रकार बना। मनु का नियम था कि कोई भी विधवा दुबारा विवाह नहीं कर सकती। लेकिन प्रज्ञानेश्वर के कथन से ऐसा प्रतीत होता है कि विष्णुस्मृति के समय से मनु के नियम की कुछ भिन्न व्याख्या की जाने लगी थी। इस नई व्याख्या के अनुसार मनु के नियम का आशय विधवा स्त्री को दो विकल्पों में किसी एक का चुनाव करने का अधिकार देना थाः (1) या तो तुम अपने पति की चिता में भस्म हो जाओ, और (2) यदि तुम ऐसा नहीं करतीं, तब अविवाहित रहो। निस्संदेह यह बिल्कुल गलत व्याख्या थी और मनु के स्पष्ट शब्दों में निहित आशय के ठीक विपरीत थी। यह किसी प्रकार ग्राह्य हो गई। विष्णुस्मृति तीसरी या चौथी शताब्दी के आसपास की रचना है। अतः यह कहा जा सकता है कि सती होने का नियम उसी समय बना था।
एक बात तो निश्चित है कि ये नियम नए थे। मनु का यह नियम की लड़की का विवाह उसके ऋतुमती होने के पहले कर देना चाहिए, एक नया नियम है। बौद्ध
याज्ञवल्क्यस्मृति, सन् 150-200 की रचना है।
विष्णुस्मृति, अध्याय 25.14
उन्होंने सन् 1070 और 1100 के बीच मिताक्षरा की रचना की।