ब्राह्मणवाद की विजय
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उसे चाहिए कि वह विवाह के पूर्व किसी भी व्यक्ति के प्रति अनुरक्त नहीं हो। यदि वह ऐसा करती है तो वह पाप है, इसलिए प्रत्येक लड़की के यह हित में है कि काम-प्रवृत्ति जागने के पहले वह उस व्यक्ति को जान ले, जिसके साथ विवाह होने वाला है।य् इसलिए लड़कियों का बचपन में ही विवाह होना शुरू हुआ।
फ्इस अलंकारिक भाषा और विलक्षण कुतर्क से यह तो पता चलता है कि यह प्रथाएं क्यों अच्छी समझी जाती थीं। लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि ये प्रथाएं क्यों अमल में लाई गईं। मेरा अपना मत तो यह है कि चूंकि ये प्रथाएं अमल में लाई गईं, इसलिए इन्हें अच्छा समझ जाने लगा। जिस किसी को 18वीं शताब्दी में व्यक्तिवाद के उदय की थोड़ी-बहुत भी जानकारी है, वह मेरी टिप्पणी से सहमत होगा। प्रत्येक युग में आंदोलन को सबसे अधिक महत्व दिया गया है और काफी समय बीत जाने के बाद उसे पुष्ट करने और नैतिक समर्थन प्रदान करने के लिए विभिन्न दर्शन उत्पन्न हो जाते हैं। इस आधार पर मेरा यह कहना है कि जिस प्रकार इन प्रथाओं की खूब प्रशंसा की गई, उससे यह सिद्ध होता है कि इन प्रथाओं को जारी रखने के लिए प्रशंसा आवश्यक रही होगी। इस प्रश्न के उत्तर में कि ये प्रथाएं क्यों उत्पन्न हुईं, मेरा यह विनम्र मत है कि जाति का ढांचा खड़ा करने के लिए इन प्रथाओं को आवश्यक समझा जाता था और इनके बारे में जिन दर्शनों का जन्म हुआ, उनका उद्देश्य उन्हें लोकप्रिय बनाना था। हम कह सकते हैं कि एक प्रकार से लोहे पर सोने-चांदी का मुलम्मा चढ़ाना था और यह प्रथाएं सीधी-सादी भोली जनता को इतनी अधिक घृणित और दहशत पैदा कर देने वाली लगी होंगी कि इनको चाशनी में पागना अत्यंत आवश्यक हो गया होगा। हालांकि इन प्रथाओं को आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाता है लेकिन ये प्रथाएं वास्तव में अत्यंत ही घृणित प्रकृति की हैं। इस मुलम्मे या चाशनी के चक्कर में हमें उन परिणामों को नहीं भूलना चाहिए, जो इनसे उत्पन्न होते हैं। हम कह सकते हैं कि साधनों को आदर्श रूप में प्रस्तुत करना आवश्यक होता है और इस विशेष मामले में ऐसा इन प्रथाओं को अधिक कारगर बनाने के लिए किया गया। साधनों को लक्ष्य कहने से हानि नहीं होती, सिवाए इसके कि इससे लक्ष्य का वास्तविक रूप छिप जाता है। लेकिन इससे उसकी वास्तविक प्रकृति नहीं समाप्त होती, और न उसके साधन ही नष्ट होते हैं। जिस प्रकार आप किसी साधन को लक्ष्य कह सकते हैं, उसी प्रकार आप यह कानून बना सकते हैं कि सभी बिल्लियां कुत्ते होती हैं। अतः यदि मैं कह दूं कि यह लक्ष्य है या यह साधन है तो कोई अनुचित नहीं। सती-प्रथा, अनिवार्य वैधव्य और बालिका विवाह प्रथाएं हैं, जिनका उद्देश्य जाति में अतिरिक्त पुरुष और अतिरिक्त स्त्री की समस्या को हल करना और सजातीय विवाह व्यवस्था को बनाए रखना था। इन प्रथाओं के बगैर सजातीय विवाह व्यवस्था को सख्ती से लागू नहीं किया जा सकता और सजातीय विवाह व्यवस्था के बगैर जाति एक धोखा है।य् पर रोक लगाकर यही उद्देश्य पूरा करना चाहता था। अंतर्जातीय