ब्राह्मणवाद की विजय
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11.189. ...उन्हें (अर्थात् परिवार से बहिष्कृत व्यक्तियों को) वस्त्र, भोजन और
पानी दिया जाए और वह (अपने परिवार के) घर के पास रहें।
3.92. वह (अर्थात् गृहस्थ) कुत्तों, बहिष्कृतों, चांडालों और पिछले पाप के लिए
दंड स्वरूप रोगों से ग्रसित व्यक्तियों, कौओं और कीड़ों-मकोड़ों के लिए धीरे से
भूमि पर (कुछ अन्न) रखें।
मनु कहता है कि बहिष्कृत व्यक्ति के साथ सामाजिक शिष्टाचार पाप है। वह स्नातक को चेतावनी देता हैः
4.79. ...बहिष्कृत व्यक्ति के साथ मत रहो।
4.213. ...बहिष्कृत व्यक्ति के द्वारा दिए गए अन्न को मत ग्रहण करो।
मनु गृहस्थ के लिए कहता हैः
3.151. वह (अर्थात् गृहस्थ) श्राद्ध में न बुलाएं।
3.157. जो व्यक्ति (पर्याप्त) कारण बिना अपनी मां, अपने पिता या गुरु को
छोड़ देता है, वह जिसने बहिष्कृतों के साथ वेद अथवा विवाह के द्वारा संबंध
स्थापित किया है।
मनु आदेश देता है कि जो लोग उस व्यक्ति से संपर्क रखते हैं, उन्हें दंडित किया जाए और इस प्रकार बहिष्कृत व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार किया जाएः
11.180. जो किसी बहिष्कृत व्यक्ति के साथ एक वर्ष तक संपर्क रखता है, यज्ञ
नहीं करने, वेद नहीं पढ़ने या उसके साथ संपर्क रखने से स्वयं भी बहिष्कृत हो
जाता है, क्योंकि इन कार्यों से वह अपनी जाति को तुरंत खो देता है, बल्कि उसके
साथ सवारी करने या उसके स्थान पर बैठने या एक ही आसन पर साथ-साथ
भोजन करने से भी (बहिष्कृत हो जाता है)।
11.181. जो व्यक्ति किसी बहिष्कृत के साथ संपर्क करता है, उसे इस संपर्क से
शुद्धि के लिए वही प्रायश्चित करना चाहिए, जो उस बहिष्कृत व्यक्ति के लिए
निर्धारित है।
इसके अलावा, जो बहिष्कृत व्यक्ति अपनी जाति की अवमानना करता है और बहिष्कृत बना रहना चाहता है, उसके लिए दंड का विधान है। मनु उसे अगले जन्म में भोगने वाले दंड का स्मरण कराता हैः
12.60. जो बहिष्कृत व्यक्ति के साथ संपर्क रखता है, वह ब्रह्मराक्षस (अर्थात्
प्रेत) बनेगा।
मनु बहिष्कृत व्यक्ति के बारे में इतने से ही संतुष्ट नहीं है। वह दंड का भी विधान