7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 193

178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

करता है, जिसकी कठोरता के बारे में कोई संदेह नहीं कर सकता। बहिष्कृत व्यक्ति के लिए मनुस्मृति में निम्नलिखित दंड विधान हैः

3.150. जो ब्राह्मण...बहिष्कृत हैं...और नास्तिक हैं, वह देव-कार्य तथा पितृ-कार्य

में (भाग लेने के) अयोग्य हैं।

9.201. ...बहिष्कृतों को पैतृक संपत्ति में कोई भाग नहीं मिलता।

11.184. लेकिन इसके बाद (अर्थात् बहिष्कृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार होने के

बाद, उसके साथ बात करना, उसके साथ बैठना-उठना, उसे पैतृक संपत्ति में भाग

देना और अन्य सलोक व्यवहार करना वर्जित है)।

11.185. और (अगर बहिष्कृत व्यक्ति ज्येष्ठ है) तब उसकी ज्येष्ठता नहीं रहती

और ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण अतिरिक्त भाग उसके स्थान पर छोटा भाई गुणवान

होने (अर्थात् जो जाति के नियमों का अनुपालन करता है) के कारण ज्येष्ठ का

अंश प्राप्त करेगा।

बहिष्कृत व्यक्ति के संबंध में मनु के नियम यही हैं। इन दंडों की कठोरता स्पष्ट है। इनका प्रयोजन उसे सभी प्रकार के लोक व्यवहार से अलग रखना, पर्व आदि पर सभी समारोहों में उसे आमंत्रित न करना, उसे सभी प्रकार के पदों के लिए अयोग्य करना और हर प्रकार की पैतृक संपत्ति से वंचित कर देना है। इन कष्टों और दंडों के अधीन बहिष्कृत व्यक्ति मृतक के समान हो जाता होगा, जैसा कि मनु उसे समझता है, उसे तर्पण देने का निर्देश देता है, जैसे वह स्वाभाविक रूप से मर गया हो। सुख-सुविधाओं से वंचित कर देने और अवमानित करने की यह पद्धति उन व्यक्तियों पर भी लागू की गई, जो बहिष्कृतों के साथ संपर्क रखने का प्रयास करते और उनके लिए भी वैसा दंड-विधान निर्धारित किया गया। यह दंड केवल बहिष्कृतों तक ही सीमित नहीं रहा, न ही यह पुरुषों तक सीमित रहा। बहिष्कृतों से संबंधित नियम पुरुषों और स्त्रियों, दोनों के लिए लागू रहे। यहां तक कि ये नियम उनकी संतत्ति पर भी लागू किए गए। यह नियम बहिष्कृत व्यक्ति के पुत्र पर भी लागू किया गया। जो पुत्र अपने पिता के बहिष्कृत होने से पहले पैदा हुआ हो, वह अपने पिता की संपत्ति को उत्तराधिकार के रूप में तुरंत प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता, मानो उसका पिता दिवंगत हो गया हो। जो बहिष्कृत होने के बाद पैदा होता, उसे उत्तराधिकार का कोई अधिकार नहीं रह जाता, अर्थात् अपने पिता के साथ वह भी बहिष्कृत हो जाता।

बहिष्कृतों के बारे में मनु के नियम निस्संदेह अन्यायपूर्ण और अमानवीय हैं। कोई यह कह सकता है कि यह कोई बहुत विलक्षण बात नहीं। इसका कारण यह है कि ये नियम धर्मविमुखता और धर्मद्रोह संबंधी नियमों की तरह हैं, जो सभी धर्म-संहिताओं में मिलते हैं। दुर्भाग्य से यह सच है। बौद्ध धर्म को छोड़कर प्रत्येक धर्म ने अपनी-अपनी संहिता में अटूट निष्ठा रखने और तद्नुसार आचरण करने पर बल देने के लिए उत्तराधिकार के