7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 194

ब्राह्मणवाद की विजय

179

नियमों का सदुपयोग अथवा दुरुपयोग किया है। सम्राट कांस्टैंटीन्स और जुलियन ने ईसाई व्यक्ति को यहूदी धर्म अपनाने या विधर्मी बन जाने या कोई और धर्म अपनाने पर दंडित किया। सम्राट थियोडोसियस और वैलेंटीनियोस ने धर्म-प्रचारकों के लिए, यदि वे उसी प्रकार अन्याय से दूसरों को पथभ्रष्ट करने का साहस करते हैं, तो मृत्युदंड तक देने की व्यवस्था की थी। यूरोप के अन्य देशों ख्1, में दंड-विधान की यही पद्धति अपने यहां ईसाई धर्म लागू करने के लिए अपनाई गई।

बहिष्कृत व्यक्ति संबंधी कानून के बारे में ऐसा दृष्टिकोण अपनाना ओछी बात है। सबसे पहली बात तो यह कि किसी व्यक्ति को बहिष्कृत करने की प्रथा को ब्राह्मणवाद ने जन्म दिया। यह पद्धति जाति प्रथा के कारण उत्पन्न हुई। ब्राह्मणवाद ने जातिप्रथा को जन्म देने का जब एक बार निश्चय कर लिया, तब बहिष्कृत व्यक्तियों के बारे में ऐसा नियम बनाना आवश्यक ही था। बहिष्कृत व्यक्ति को दंडित कर ही जातिप्रथा लागू की जा सकती थी। दूसरे, ईसाई धर्म या मुसलमान धर्म के धर्मविमुखता संबंधी नियमों और ब्राह्मणवाद के जाति संबंधी नियमों में अंतर है। ईसाई या मुसलमान धर्म में विधर्मी होने का अर्थ, धर्म में आस्था न रखने या धर्म का गलत निर्वचन करने तक सीमित था। ब्राह्मणवाद में विधर्मी होने का संबंध धार्मिक आस्था नहीं होने या उसका अभाव हो जाने से बिल्कुल भी नहीं था। इसका संबंध एक सामाजिक संस्था, अर्थात् जातिप्रथा को मानने या न मानने से था। इस जाति से बाहर चले जाने को दंडनीय समझा गया। यह एक महत्वपूर्ण अंतर है।

ब्राह्मणवाद धर्म के बहिष्कृत व्यक्ति संबंधी नियमों की तुलना अगर अन्य धर्मों के विधर्मिता संबंधी नियमों से की जाए, तो स्पष्ट हो जाएगा कि ब्राह्मण धर्म में ईश्वर में आस्था रखना आवश्यक नहीं है, मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखना ब्राह्मणवाद में आवश्यक नहीं है, सदाचार के द्वारा मुक्ति या ईश्वर के दूत में विश्वास रखना ब्राह्मण धर्म में आवश्यक नहीं है, लेकिन वेदों की पवित्रता में विश्वास रखना ब्राह्मणवाद में आवश्यक है। केवल यही एक चीज है जो ब्राह्मणवाद में आवश्यक है। केवल जाति का उल्लंघन ही दंडनीय है। बाकी अन्य का उल्लंघन किया जा सकता है।

जो लोग एकीकरण की इन शक्तियों को देखते-समझते हैं, वे यह स्वीकार करेंगे कि अंतर्जातीय विवाह या सहभोज का निषेध करना समाज को तोड़ देने के बराबर है। यह एकता के लिए मौत का पैगाम है, एकजुट होकर काम करने के रास्ते में एक जबरदस्त बाधा है। हम आगे चलकर देखेंगे कि ब्राह्मणवाद गैर-ब्राह्मणों द्वारा इसे उखाड़ फेंकने के लिए हर संयुक्त कार्रवाई को विफल करने के बारे में सचेत था। और इसीलिए उसने भारतीय समाज को इस प्रकार वर्गों में विभाजित किया। लेकिन किसी भी विष का प्रभाव

  1. देखिए, लॉज ऑफ इंग्लैंड पर स्टीफन की टीका (15वां संस्करण), खंड 4, पृ. 179