180 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उसका प्रयोग करने वाले के मूल उद्देश्य तक सीमित नहीं रह सकता। यही जाति के मामले में भी हुआ। ब्राह्मणवाद ब्राह्मणों के विरुद्ध गैर-ब्राह्मणों को पंगु बना देना चाहता था, उसकी योजना उन्हें राष्ट्र के रूप में विदेशी शक्ति के विरुद्ध पंगु बना देने की नहीं थी। लेकिन जाति रूपी विष का परिणाम यह है कि उनमें ब्राह्मणवाद के ही नहीं, विदेशी शक्तियों के विरुद्ध भी सिर उठाने की शक्ति नहीं रह गई। दूसरे शब्दों में, ब्राह्मणवाद ने जातिप्रथा को जन्म देकर राष्ट्रीयता के विकास को भी महान क्षति पहुंचाई।
चाहे लोग कुछ भी कहें, हिंदू जातिप्रथा में किसी भी दोष को स्वीकार नहीं करेगा और एक दृष्टि से यह सही भी है। प्रत्येक परिवार में उसके सदस्यों में एक-दूसरे के प्रति प्रेम, एकता और सहायता करने की भावना होती है। चोरों में भी एक-दूसरे के सामान्य हितों के प्रति सद्भाव होता है। डाकुओं के गिरोह में सब का एक ही स्वार्थ होता है और सब एक-दूसरे का ख्याल रखते हैं। इनके गिरोह चाहे एक-दूसरे के विरोधी क्यों न हों, तब भी इनमें परस्पर भाईचारे और अपने-अपने लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना होती है। और इसी से ये पहचाने जाते हैं। इसी प्रकार हम कह सकते हैं कि एक जाति में वे सभी गुण होते हैं जो किसी समाज में होने चाहिए।
इसमें परस्पर प्रेम, एकता और एक-दूसरे की सहायता करने की प्रबल भावना होती है जो किसी परिवार के गुण कहे जाते हैं। चोरों जैसी बंधुत्व की भावना का इसे श्रेय प्राप्त है। इसमें निष्ठा और भाईचारे की यह भावना भी होती है, जो हमें भिन्न-भिन्न गिरोहों में मिलती है और इसमें समान हित या स्वार्थ की वह भावना भी होती है, जो डाकुओं में मिलती है।
जाति में इन प्रशंसनीय गुणों के होने के कारण हिंदू गौरव का अनुभव कर सकता है और यह कह सकता है कि ‘जाति’ में कोई दोष नहीं होता। लेकिन वह यह भूल जाता है कि उसकी जाति के बारे में यह धारणा, कि यह सामाजिक संगठन का एक आदर्श रूप है, जो इस अनुमान या कल्पना पर आश्रित है कि प्रत्येक जाति अपने आपको एक स्वतंत्र समाज कह सकती है, यही उसका लक्ष्य है, जैसा कि किसी राष्ट्र के संबंध में होता है। लेकिन जब हम हिंदू समाज और उसी के अनुरूप जातिप्रथा पर विचार करते हैं, तब यह सिद्धांत अर्थहीन हो जाता है।
यहां तक कि इस विषय पर विचार करते समय हिंदू यह कभी नहीं स्वीकार करेगा कि जातिप्रथा एक बुरी प्रथा है। आप हिंदुत्व को जातिप्रथा के दोषों के लिए उत्तरदायी ठहराएं, तब हिंदू तुरंत कह उठेगा कि ‘यूरोप में भी वर्ग प्रणाली (क्लास सिस्टम) है।’ इस प्रतिक्रिया का आशय अगर यह है कि दार्शनिकों का ऐसा समाज तो कहीं नहीं है, जहां मूलभूत एकता हो, सबका एक जैसा उद्देश्य हो, परस्पर सहानुभूति हो, सार्वजनिक हित के प्रति निष्ठा हो और सबके कल्याण की चिंता हो। अगर हिंदू यह कहे कि