ब्राह्मणवाद की विजय
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प्रत्येक समाज में ऐसे परिवार और वर्ग होते हैं, जहां अलगाव, संदेह और ईर्ष्या उन्हीं परिवारों और वर्गों की भांति पाई जाती है, जहां डाकुओं के गिरोह, गुटबाजी, संकीर्ण दलबंदी, ट्रेड यूनियन, कर्मचारी संगठन, कार्तेल, चैम्बर ऑफ कॉमर्स और राजनैतिक पार्टियां होती हैं, तो किसी को क्या शिकायत हो सकती है। इनमें से कुछ स्वार्थ और लूटने के कारण आपस में संगठित होती हैं और बाकी ऐसी जो जनता की सेवा करने का उद्देश्य लेकर उठ खड़ी होती हैं, लेकिन वह उसको अपना शिकार बनाने में कोई संकोच नहीं करतीं।
यह स्वीकार किया जा सकता है कि हर जगह वास्तविक समाज पूर्ण रूप से एक नहीं होता, बल्कि उसमें छोटे-छोटे वर्ग होते हैं, जिनकी अपनी-अपनी समस्याएं होती हैं और ये समस्याएं उन तात्कालिक और विशिष्ट प्रयोजनों से प्रेरित होती हैं। लेकिन हिंदू अपनी जाति व्यवस्था और गैर-हिंदू वर्ग प्रणाली के बीच इस समानता को अपनी ढाल नहीं बना सकता और उसके पीछे दुबक कर बैठा नहीं रह सकता जैसे इस विषय पर और कुछ करने के लिए नहीं रह गया है। सच तो यह है कि इससे भी बड़ा प्रश्न है, जिसका उसे उत्तर देना है। उसे इस तथ्य पर विचार करना चाहिए कि हालांकि हर समाज में वर्ग होते हैं, कुछ ऐसे समाज हैं जिनमें वर्ग असामाजिक होते हैं और कुछ ऐसे भी समाज हैं जिनमें वर्ग समाज-विरोधी होते हैं। वर्ग-प्रणाली वाले समाज और जाति-प्रणाली वाले समाज में अंतर सिर्फ इस बात में है कि वर्ग-प्रणाली सिर्फ गैर-सामाजिक होती है, लेकिन जाति-प्रणाली तो निश्चित रूप से समाज-विरोधी है।
यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि किसी समाज में वर्ग-प्रणाली गैर-सामाजिक भावना को क्यों पैदा करती है और दूसरे समाज में समाज-विरोधी भावना क्यों पैदा करती है। इसका जो स्पष्टीकरण प्रोफेसर जॉन डेवी ने दिया है, उससे अधिक अच्छा स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सकता। उनके मतानुसार हर चीज इस बात पर निर्भर करती है कि ये वर्ग अलग-अलग हैं या एक-दूसरे से संबद्ध हैं। क्या ये एक-दूसरे के हितों के बारे में ख्याल रखते हैं, या उनमें इस भावना का अभाव है। अगर ये वर्ग एक-दूसरे से संबद्ध है, अगर इनमें एक-दूसरे के हितों के बारे में ख्याल नहीं है तब उनमें एक-दूसरे के प्रति सिर्फ गैर-सामाजिक भावना होगी। अगर इन वर्गों एक-दूसरे के हित के बारे में ख्याल नहीं है तब इनमें समाज-विरोधी भावना होगी। प्रोफेसर डेवी ख्1, के शब्दों मेंः
दल या गुट की अपनी पृथकता और एकांतता के कारण समाज-विरोधी भावना व्याप्त हो जाती है और जहां भी किसी वर्ग का स्वार्थ अपने तक सीमित होता है, वहां ऐसी ही भावना पाई जाती है। इससे उसका पूर्ण संपर्क दूसरे वर्गों के साथ नहीं रहता और
- डेमोक्रेसी एंड एजूकेशन, पृ. 99