7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 197

182 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

फ्दल या गुट की अपनी पृथकता और एकांतता के कारण समाज-विरोधी भावना

व्याप्त हो जाती है। और जहां भी किसी का स्वार्थ अपने तक सीमित होता है, वहां

ऐसी ही भावना पाई जाती है। इससे उसका पूर्ण संपर्क दूसरे वर्गों के साथ नहीं रहता

और उसका मुख्य उद्देश्य पुनर्गठित और संपर्क द्वारा प्रगति करने के बजाए उसी की रक्षा

करना रह जाता है, जो उसके पास पहले से ही है। यह भावना राष्ट्रों को एक-दूसरे से

अलग कर देती है। इसी प्रकार जो परिवार अपने घरेलू मामलों में उलझे रहते हैं, जैसे

उनका व्यापक जीवन में कोई संबंध न हो, स्कूल भी तब अलग जा पड़ते हैं, जब उनका

घर और समुदाय से कोई संबंध न हो, स्कूल भी तब अलग जा पड़ते हैं, जब उनका

घर और समुदाय से कोई संबंध नहीं रहता, अमीर और गरीब, शिक्षित और अशिक्षित

में भेद बढ़ जाता है। मुख्य बात यह है कि पृथकता से जीवन संकीर्ण और औपचारिक

मात्र रह जाता है, वर्ग में उसके आदर्श जड़ और स्वार्थपूर्ण हो जाते हैं।य्

प्रश्न यह है कि क्या समाज में वर्ग हैं या समाज एक संपूर्ण इकाई होता है। प्रश्न यह है कि विभिन्न वर्गों में परस्पर साहचर्य, सहयोगात्मक संपर्क और संबंध किस मात्रा से हद तक रहता है। उनके ऐसे कौन से उद्देश्य हैं, जिनमें वे प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे सहभागी रहते हैं। अन्य संस्थाओं के साथ संबंध रखने में वे कितने मुक्त हैं? कोई समाज इसलिए अवांछनीय नहीं है कि उसमें कई वर्ग हैं। यह तब अवांछनीय हो जाता है जब उनके वर्ग अलग-अलग हो जाते हैं। हर वर्ग की अपनी कार्यशैली होती है। इसी से अलग-अलग रहने की प्रवृत्ति-समाज-विरोधी भावना का पैदा होना संभव हो जाता है।

वर्गों में एक-दूसरे से अलग-अलग रहना ब्राह्मणवाद के कारण हुआ। इसके लिए ब्राह्मणवाद ने प्रमुखतः जो कार्य किया, अंतर्जातीय विवाह और सहभाज की प्रणाली को समाप्त करना था, जो प्राचीन-काल में चारों वर्णों में प्रचलित थी। इस बारे में हम इस अध्याय के पहले खंड में चर्चा कर चुके हैं। इस वृत्त का एक भाग कहा जाना बाकी। है। मैं कह चुका हूं कि वर्ण-व्यवस्था का विवाह से कोई संबंध नहीं था। और विभिन्न वर्णों के पुरुष और स्त्रियां आपस में विवाह कर सकते थे और उन्होंने किया भी। कानून अंतर्वर्ण विवाह के रास्ते आड़े नहीं आता था। इन विवाहों का विरोध समाज में नैतिकता की दृष्टि से भी नहीं होता था। सवर्ण विवाह करना न तो कानूनन जरूरी समझा जाता था और न समाज ही इस पर बल देता था। इस बात के बावजूद कि वर की अपेक्षा वधू उच्च वर्ण की है या वर उच्च वर्ण का है और वधू निम्न वर्ण की है, विभिन्न वर्णों के सभी विवाह वैध होते थे। वास्तव में जैसा कि प्रो. काणे कहते हैं, अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों के अंतर को कोई नहीं जानता था और स्थिति यह थी कि अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों, अर्थात् उच्च वर्ण की स्त्री और निम्न वर्ण के पुरुष के बीच विवाह पर रोक लगा दी। यह वर्णों के बीच आपसी संबंध को समाप्त करने और इनमें एक-दूसरे के प्रति गैर-भावना पैदा करने की दिशा में एक कदम था। लेकिन जहां प्रतिलोम विवाह के द्वारा अंतः संबंधों