ब्राह्मणवाद की विजय
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का द्वार खुला रखा गया, उसे बंद किया गया। जैसा कि क्रमिक असमानता विषयक खंड में कहा गया है, ब्राह्मणवाद ने अनुलोम विवाह, अर्थात् उच्च वर्ण के पुरुष और निम्न वर्ण की स्त्री के बीच विवाह जारी रखा। अनुलोम विवाह बहुत अच्छा नहीं कहा गया और यह सिर्फ एक ओर जाने का द्वार था, तो भी यह एक-दूसरे को मिलाने वाला द्वार था जिसके माध्यम से वर्णों का एक-दूसरे से बिल्कुल अकेले होने से रोकना संभव था। लेकिन यहां पर भी ब्राह्मणवाद ने चाल चली, जिसे ओछापन ही कहा जाएगा। यह कार्य कितना ओछा था, उन नियमों का यहां बताना आवश्यक है जो शिशु की स्थिति निर्धारित करने के लिए बनाए गए। प्राचीन-काल से चले आ रहे नियमों के अधीन शिशु की स्थिति उसके पिता के आधार पर निर्धारित की जाती थी। मां के वर्ण का कोई महत्व नहीं था।
निम्नलिखित उदाहरणों से यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगीः
पिता का पिता का मां का मां का शिशु का शिशु का
नाम वर्ण नाम वर्ण नाम वर्ण
- शांतनु क्षत्रिय गंगा शूद्र भीष्म क्षत्रिय
- शांतनु क्षत्रिय मत्स्यगंधा अनामिका विचित्र वीर्य क्षत्रिय
(धीवर)
- पाराशर ब्राह्मण मत्स्यगंधा शूद्र कृष्ण-द्वैपायन ब्राह्मण
(धीवर)
- विश्वामित्र क्षत्रिय मेनका अप्सरा शकुंतला क्षत्रिय
- ययाति क्षत्रिय देवयानी ब्राह्मण यदु क्षत्रिय
- ययाति क्षत्रिय शर्मिष्ठा आसुरी दु्रह्य क्षत्रिय
(अनार्य)
- जरत्कारू ब्राह्मण जरत्कारि नाग असित ब्राह्मण
(अनार्य)
यह नियम पितृ-सवर्ण्य का नियम कहलाता था। अनुलोम और प्रतिलोम विवाह-पद्धतियों पर इस पितृ-सवर्ण्य नियम के प्रभाव का विवेचन एक रोचक विषय है।
प्रतिलोम विवाह का प्रभाव यह होगा कि उच्च वर्ग की माताओं के बच्चे नीचे के वर्ण के कहलाएंगे, जो उनके पिता का है। अनुलोम विवाह पर इसका प्रभाव उलटा होगा। नीचे के वर्ण की माताओं के बच्चे ऊंचे वर्ण के कहलाएंगे, जो उनके पिता का वर्ण है।
मनु के प्रतिलोम विवाह को रोक दिया और इस प्रकार उच्च वर्ण के आने पर रोक लगा दी। यह चाहे जितना भी खेदजनक क्यों न हो, जब तक अनुलोम विवाह और पितृ-सवर्ण्य का नियम व्यवहृत होता रहा, तब तक कोई अधिक क्षति नहीं हुई। इन दोनों ने मिलकर एक बहुत ही उपयोगी व्यवस्था का निर्माण किया। अनुलोम विवाह-पद्धति ने परस्पर संबंध