ब्राह्मणवाद की विजय
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2.32. ब्राह्मण के नाम का दूसरा भाग ऐसा हो जिसमें सुख का भाव निहित हो,
क्षत्रिय का ऐसा हो जिसमें रक्षा का भाव और वैश्य का ऐसा हो जिसमें समृद्धि
का भाव तथा शूद्र का ऐसा हो जो सेवा करने का भाव सूचित करे।
इन सारे अमानवीय नियमों का आधार वह सिद्धांत है, जिसका प्रतिपादन मनु ने शूद्रों के संबंध में किया था। स्मृति में आरंभ में मनु जोरदार शब्दों में और बिना हिचक कहता हैः
1.91. ब्रह्मा ने शूद्र के लिए केवल एक कर्म निर्धारित किया है कि वह विनम्र
होकर इन तीन अन्य जातियों (अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) की सेवा करे।
मनु ने यह निश्चित करने के बाद कि शूद्र का जन्म दास बनने के लिए हुआ है, तद्नुसार अपने नियम बनाए जिससे उसे नीच बने रहने के लिए बाध्य किया जा सके। बौद्ध काल में शूद्र न्यायाधीश, पुजारी और यहां तक कि राजा बनने की इच्छा कर सकता था जो उच्चतम पद था और जहां तक पहुंचने की उसकी इच्छा हो सकती थी। इसकी तुलना उस आदर्श से कीजिए जो मनु शूद्र के सम्मुख प्रस्तुत करता है तो आपको ब्राह्मणवाद के अंतर्गत उसके लिए नियम किए गए भाग्य का अंदाजा लग जाएगा।
10.121. यदि कोई ब्राह्मणों की सेवा करके अपना जीवन निर्वाह करने में असमर्थ
है। तब वह क्षत्रिय की सेवा करे या वह किसी धन वैश्य की सेवा कर अपना
जीवन-निर्वाह करे।
10.122. लेकिन शूद्र ब्राह्मण की सेवा स्वर्ग अथवा दोनों इस जीवन और इसके
बाद जीवन के लिए करे क्योंकि जो ब्राह्मण का सेवक कहलाता है, वह कृतकृत्य
हो जाता है।
10.123. शूद्र का उत्तम कर्म केवल ब्राह्मणों की सेवा करना कहा गया है, क्योंकि
इसके अतिरिक्त वह जो कुछ करता है, उसका उसे कुछ भी फल नहीं मिलता।
10.124. ब्राह्मणों को चाहिए कि वह उस शूद्र की योग्यता, उसके उत्साह और
उनकी संख्या पर विचार कर जिनको उसे आश्रय देना है, अपने परिवार (संपत्ति)
में से उसकी जीविका निश्चित करें।
10.125. उसके लिए बचा हुआ अन्न और पुराने खाट-बर्तन आदि दिए जाएं। मनु
जितना शूद्र के प्रति कठोर है, स्त्रियों के प्रति वह उससे कम कठोर नहीं है। वह
स्त्रियों के बारे में ऊंची धारणा नहीं रखता। मनु कहता हैः
2.213. इस संसार में स्त्रियों का स्वभाव पुरुषों को मोहित करना है। इस कारण
बुद्धिमान स्त्रियों के बीच अरक्षित नहीं रहते।