7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 205

190 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

2.214. क्योंकि स्त्रियां इस संसार में केवल मूर्ख को ही नहीं, बल्कि विद्वानों को भी पथभ्रष्ट करने और उन्हें काम और क्रोध का दास बना देने में सक्षम हैं। 2.215. कोई किसी की माता, बहन या पुत्री के साथ एकांत में न बैठे, क्योंकि इंद्रियां शक्तिशाली होती हैं और विद्वान को भी अपने वश में कर लेती हैं। 9.14. स्त्रियां रूप की अपेक्षा नहीं करतीं, न उनका ध्यान आयु पर रहता है। वह यह सोचकर कि (यह ही पर्याप्त है कि) वह पुरुष है, सुंदर या कुरूप के साथ संभोग कर बैठती हैं।

9.15. चाहे इस संसार में जितनी भी रक्षा क्यों न की जाए, पुरुषों के प्रति अपनी काम-भावना, अपनी चंचल प्रकृति और अपनी स्वाभाविक हृदयहीनता के कारण वह अपने पति के प्रति निष्ठारहित हो जाती हैं।

9.16. उनका ऐसा स्वभाव जानकर, जो ब्रह्मा ने उन्हें अपनी सृष्टि के समय दिया है, प्रत्येक मनुष्य को उनकी रक्षा के लिए विशेष अमल करना चाहिए। 9.17. मनु ने स्त्रियों की सृष्टि करते समय इनमें (अपनी) शैया, (अपने) स्थान और (अपने) आभूषणों के लिए प्रेम, वासना, क्रोध, बेइमानी, ईर्ष्या और दुराचरण निहित किया है।

स्त्रियों के प्रति मनु के ये नियम अकाट्य हैं। स्त्रियां किसी भी परिस्थिति में स्वतंत्र नहीं हैं। मनु के मतानुसारः

9.2. स्त्रियों को उनके परिवारों के पुरुषों द्वारा दिन-रात अधीन रखा जाना चाहिए और यदि वे अपने को विषयों में आसक्त करें तो उन्हें अपने नियंत्रण में अवश्य रखें।

9.3. स्त्री की रक्षा उसके बचपन में उसका पिता करता है, युवावस्था में उसका पति, जब उसका पति दिवंगत हो जाता है, तब उसके पुत्र (उसकी रक्षा करते हैं)। स्त्री कभी भी स्वतंत्र रहने योग्य नहीं है।

9.5. स्त्रियों की विशेषकर रक्षा दुष्प्रवृत्ति से की जानी चाहिए, जो चाहे कितनी भी नगण्य (क्यों न प्रतीत हों), क्योंकि यदि उनकी रक्षा नहीं की गई तो वे दोनों परिवारों के क्लेश का कारण बनती हैं।

9.6. इसे सभी वर्णों का उत्तम धर्म समझते हुए, दुर्बल पतियों को भी अपनी पत्नी की रक्षा करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए।

5.147. लड़की को, नवयुवती को या वृद्धा को भी अपने घर में कोई काम स्वतंत्रतापूर्वक नहीं करना चाहिए।