192 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
9.146. पत्नी, पुत्र और दास, इन तीनों के पास कोई संपत्ति नहीं हो। वे जो संपत्ति
अर्जित करें, वह उसकी होती हैं, जिसकी वह पत्नी/पुत्र/दास हैं।
परिवार में रहते हुए अगर वह विधवा हो जाए, तब मनु उसके लिए निर्वाह-योग्य व्यय की अनुमति देता है। और अगर उसका पति अपने परिवार से अलग था, तब उसे उसके पति की संपत्ति में से विधवा को संपत्ति मिलेगी। लेकिन मनु उसे संपत्ति पर अधिकार की अनुमति नहीं देता।
मनु के नियमों के अधीन स्त्री को शारीरिक दंड दिया जा सकता है और मनु पति को अपनी पत्नी को मारने-पीटने की अनुमति देता है।
8.299. स्त्री, पुत्र, दास, शिष्य और छोटा भाई यदि अपराध करे, तब रस्सी से या
बांस की छड़ी से पीटना चाहिए।
अन्य परिस्थितियों में मनु स्त्री का स्थान शूद्र के स्थान के समान मानता है। उसे वेद का अध्ययन मनु द्वारा उसी प्रकार निषिद्ध किया गया जिस प्रकार शूद्र को।
2.66. स्त्री के लिए भी संस्कारों का किया जाना जरूरी है और वे किए जाने
चाहिए। लेकिन ये वेद मंत्रों के बिना किए जाने चाहिए।
9.18. स्त्रियों को वेद पढ़ने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए उनके संस्कार
वेद-मंत्रों के बिना किए जाएं। चूंकि स्त्रियों को वेद को जानने का अधिकार नहीं
है इसलिए उन्हें धर्म का कोई ज्ञान नहीं हो। पाप दूर करने के लिए वेद-मंत्रों का
पाठ उपयोगी है। चूंकि स्त्रियां वेद-मंत्रों का पाठ नहीं कर सकतीं, वे उसी प्रकार
अपवित्र हैं जिस प्रकार असत्य अपवित्र होता है।
ब्राह्मण मत के अनुसार, यज्ञ करना धर्म का सार है, फिर भी मनु स्त्रियों को यज्ञ करने की अनुमति नहीं देता। मनु निदेश देता हैः
11.36. स्त्री वेद विहित दैनिक अग्निहोत्र नहीं करेगी।
11.37. यदि वह करती है, तब वह नरक में जाएगी।
मनु स्त्री को ब्राह्मण पुरोहित की सहायता व उसकी सेवा ग्रहण करने से वर्जित करता है, जिससे वह यज्ञ-कर्म न कर सके।
4.205. ब्राह्मण उस यज्ञ-कर्म में दिए गए भोजन को ग्रहण न करे, जो किसी
स्त्री द्वारा किया गया हो।
4.206. जो यज्ञ कर्म स्त्रियों द्वारा किए जाते हैं, वे अशुभ और देवताओं को
अस्वीकार्य होते हैं। अतः उसमें भाग नहीं लेना चाहिए।