ब्राह्मणवाद की विजय
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स्त्रियों को कोई बौद्धिक कार्य नहीं करना चाहिए, उनको स्वतंत्र इच्छा नहीं करनी चाहिए और न ही उन्हें अपने विचारों में स्वतंत्र होना चाहिए। वह कोई अन्य धर्म, जैसे बौद्ध धर्म स्वीकार नहीं कर सकतीं। यदि वह आजीवन उसका पालन करती हैं तब उन्हें जल का तर्पण नहीं किया जाएगा, जो अन्य मृतकों के लिए किया जाता है।
अंत में, जीवन के उस आदर्श को भी देखिए जो मनु स्त्रियों के लिए निर्धारित करता है। इसे उसी के शब्दों में कहना उचित होगाः
5.151. वह आजीवन उसकी आज्ञा का पालन करेगी जिसे उसका पिता, या उसका
भाई अपने पिता की अनुमति से उसे सौंप देगा और जब वह दिवंगत हो जाए तब
उसके श्राद्ध आदि कर्म का उल्लंघन नहीं करेगी।
5.154. चाहे पति सदाचार से हीन हो, या वह अन्य स्त्री में आसक्त हो, या वह
सद्गुणों से ही हीन हो, तो भी वह पतिव्रता स्त्री के द्वारा देवता के समान पूज्य
होता है।
5.155. स्त्री पति से पृथक कोई यज्ञ, कोई व्रत या उपवास न करे_ यदि स्त्री अपने
पति का अनुपालन करती है, तब वह इस कारण ही स्वर्ग में पूजित होती है।
अब उन विशिष्ट सूत्रों पर ध्यान दीजिए, जो उस आदर्श के आधार हैं जिसे मनु ने स्त्रियों के लिए प्रस्तुत किया है।
5.153. जिस पति ने किसी का वरण अपनी पत्नी के रूप में पवित्र मंत्रों के
उच्चारण के बाद किया है, वह उसके लिए ऋतुकाल में तथा ऋतुभिन्न काल में
भी नित्य ही इस लोक में तथा परलोक में सुख देने वाला होता है।
5.150. उसे सर्वदा प्रसन्न, गृह-कार्य में चतुर, घर में बर्तनों को स्वच्छ रखने में
सावधान तथा खर्च करने में मितव्ययी होना चाहिए।
हिंदू लोग इसे स्त्रियों के लिए सर्वोच्च आदर्श समझते हैं।
शूद्रों और स्त्रियों के बारे में इन नियमों का कठोर होना यह प्रमाणित करता है कि बौद्ध-काल में इन वर्गों के अभूतपूर्व अभ्युदय ने ब्राह्मणों को रुष्ट ही नहीं किया, बल्कि उनकी स्थिति इन्हें असहनीय हो गई थी। यह ऊपर से नीचे तक उनकी पवित्र सामाजिक व्यवस्था को पूरी तरह उलट देना था। जिसका स्थान प्रथम था, वह अंतिम हो गया और जो अंतिम स्थान पर था, वह प्रथम स्थान पर आ गया था। मनु के नियम से यह भी स्पष्ट होता है कि ब्राह्मणों ने किस प्रकार जान-बूझकर शूद्रों और स्त्रियों को पदावनत कर उनकी स्थिति पर लाने के लिए अपनी राजनैतिक शक्ति का उपयोग किया। विजयोन्मत्त ब्राह्मणों ने पुराने आदर्श के अनुसार अर्थात् इनको