ब्राह्मणवाद की विजय
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3.112. यदि कोई वैश्य और कोई शूद्र उसके घर अतिथि के रूप में आ जाए,
तब वह उसे दया भाव से अपने सेवकों के साथ भोजन करा सकता है।
ब्राह्मण के घर में ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी और को अतिथि बनने का गौरव नहीं मिल सकता। ख्1, अगर कोई क्षत्रिय अतिथि के रूप में ब्राह्मण के घर आता है, तब उसे सभी ब्राह्मणों के बाद भोजन कराना चाहिए और अगर वैश्य और शूद्र अतिथि के रूप में आएं, तब उन्हें सब लोगों के बाद और केवल नौकरों के साथ भोजन कराना चाहिए।
संस्कारों के बारे में मनु के नियम देखिएः
10.126. शूद्र को यह अधिकार नहीं है कि उसका संस्कार हो।
10.68. यह विधान है कि इन दोनों (अर्थात् जो मिश्रिम जाति के हैं) में से कोई
भी संस्कार के योग्य नहीं है, पहला वह जो नीच माता-पिता से उत्पन्न होने के
कारण जातियों के क्रम के प्रतिलोम हैं और नीच हैं।
2.66. स्त्रियों के सारे संस्कार ख्2, उनकी काया को पवित्र करने के लिए उचित समय
पर तथा उचित क्रम से किए जाने चाहिए। लेकिन यह पवित्र मंत्रों के उच्चारण
के बिना हो।
मनु और आगे निर्धारित करता हैः
6.1. द्विज स्नातक जो इस प्रकार गृहस्थाश्रम के नियमों के अनुसार जीवनयापन
कर चुका है, संकल्प-मन हो और अपनी इंद्रियों को अपने अधीन कर (नीचे दिए
गए नियमों का विधिवत् पालन करते हुए) वन में रहे।
6.33. और इस प्रकार (पुरुष की सामान्य आयु) का तृतीयांश वन में बिताने
के बाद वह सभी सांसारिक विषयों में आसक्ति को त्याग कर अपनी आयु का
चतुर्थांश संन्यासी के रूप में व्यतीत करे।
मनु ने वर्गीकृत असमानता को न्याय-व्यवस्था का भी आधार बनाया है। उदाहरण के लिए केवल दो, मानहानि व दुर्व्यवहार और मारपीट संबंधी कानून लीजिएः
8.267. ब्राह्मण से कटु वचन बोलने वाले क्षत्रिय को सौ पण, वैश्व को डेढ़ सौ
या दो सौ पण का दंड और शूद्र को शारीरिक दंड दिया जाए।
8.268. क्षत्रिय से कटु वचन बोलने वाले ब्राह्मण को पचास पण, वैश्य के मामले
में पच्चीस पण और शूद्र के मामले में बारह पण का दंड दिया जाए।
- मनु अतिथि शब्द का प्रयोग पारिभाषिक अर्थ में करता है और इसका अर्थ उस ब्राह्मण से है, जो केवल
एक रात्रि के लिए रुकता है। देखिए 3.102
- उपनयन के अतिरिक्त सभी संस्कार, जो स्त्रियों के लिए वर्जित हैं।