7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 211

196 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

8.269. समान जाति (वर्ण) वाले से कटु वचन बोलने वाले द्विज को बारह पण

तथा ऐसे वचन बोलने पर जो उच्चारण योग्य नहीं है, प्रत्येक अपराध के लिए

दुगना दंड दिया जाना चाहिए।

8.276. ब्राह्मण और क्षत्रिय द्वारा एक-दूसरे को अपवचन कहने पर विवेकशील

राजा ब्राह्मण को सबसे कम आर्थिक दंड और क्षत्रिय को सबसे मध्यम आर्थिक

दंड दे।

8.277. वैश्य और शूद्र को भी इसी प्रकार उनकी अपनी जातियों के अनुसार दंड देना

चाहिए लेकिन उसकी (शूद्र की) जीभ नहीं काटनी चाहिए, यही निर्णय है।

8.279. नीची जाति का व्यक्ति अपने जिस किसी भी अंग से (तीन उच्च जातियों

के) व्यक्ति को क्षति पहुंचाए, वह अंग ही काट दिया जाए, यह मनु का आदेश

है।

8.280. जो अपना हाथ उठाए या लाठी या छड़ी ले, उसका हाथ काट दिया जाए,

अगर वह कु्रद्ध हो अपने पैर से मारे, तब उसका पैर काट दिया जाए। यह मनु

का आदेश है।

वर्गीकृत असमानता का सिद्धांत सभी जगह मिलता है। यह सामाजिक व्यवस्था के लिए इतना पक्का हो गया कि जहां कहीं मनु इसे अपना आधार बनाने से चूक गया वहां उनके अनुयायियों ने इसे ला देने में कोई भी चूक नहीं की। उदाहरणार्थ, मनु ने दास प्रथा को मान्यता दी थी, लेकिन वह यह सुनिश्चित नहीं कर पाया था कि वर्गीकृत असमानता का सिद्धांत दास प्रथा का आधार बन सकता है या नहीं।

कहीं यह समझ जाएं कि वर्गीकृत असमानता दासत्व का आधार नहीं बन सकती और ब्राह्मण शूद्र का दास बन सकता है। याज्ञवल्क्य इस संदेह को शीघ्र ही स्पष्ट कर देते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा थाः

14.183. दासत्व का आधार वर्णों का अवरोही क्रम है न कि आरोही क्रम।

याज्ञवल्क्य स्मृति की शंका में प्रज्ञानेश्वर ने अपना एक उदाहरण देकर उक्त कथन की पुष्टि की है। वह लिखते हैंः

ब्राह्मण और शेष वर्णों आदि में दासत्व का आधार अवरोही क्रम में अनुलोम्येन

होगा। इस प्रकार क्षत्रिय और शेष वर्ण ब्राह्मण का दास हो सकता है, वैश्य और

शूद्र क्षत्रिय का, और शूद्र वैश्य का दास हो सकता है। इस प्रकार दास प्रथा

अवरोही क्रम में व्यवहृत होगी।

समानता और असमानता की भाषा में कहा जाए तो इसका अर्थ है कि चूंकि ब्राह्मण