7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 212

ब्राह्मणवाद की विजय

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किसी का भी दास नहीं हो सकता और उसे किसी भी वर्ग के व्यक्ति को अपने दास के रूप में रखने का अधिकार है अतः वह उच्चतम है। चूंकि शूद्र को हर वर्ग अपने दास के रूप में रख सकता है और वह शूद्र के अतिरिक्त किसी को भी अपना दास नहीं बना सकता अतः वह निम्नतम है। क्षत्रिय और वैश्य को जो स्थान दिया गया है, उससे वर्गीकृत असमानता की प्रणाली लागू हो जाती है। चूंकि क्षत्रिय ब्राह्मण से हीन है इसलिए वह उन्हें अपना दास बनाकर रख सकता है, वैश्यों और शूद्रों को क्षत्रिय को अपने दास के रूप में रखने का कोई अधिकार नहीं है। इसी प्रकार वैश्य, जो ब्राह्मणों और क्षत्रियों से हीन है और जिसे वे अपना दास बना सकते हैं। लेकिन वह इनमें से किसी को भी अपना दास नहीं बना सकता, वह गर्व कर सकता है कि वह कम से कम शूद्र से तो श्रेष्ठ है और उसे वह अपना दास बना सकता है। लेकिन शूद्र वैश्य को अपना दास नहीं बना सकता।

यही वर्गीकृत असमानता का सिद्धांत है, जिसे ब्राह्मणवाद ने समाज की ह्यिस्त्रयों और मज्जा में घोल दिया। अन्याय को समाप्त करने के लिए समाज को पंगु बनाने के लिए इससे अधिक बुरा कुछ और नहीं किया जा सकता था। हालांकि इसके प्रभाव स्पष्ट रूप से नजर नहीं आते लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसके कारण हिंदू पंगु हो गए। समाज का अध्ययन करने वाले विद्यार्थी समानता और असमानता के बीच अंतर को पढ़कर संतुष्ट हो जाते हैं। कोई यह नहीं अनुभव करता कि समानता और असमानता के अलावा वर्गाश्रित असमानता जैसी भी एक चीज है। यह वर्गीकृत असमानता जितनी हानिकर है, उसकी आधी भी असमानता हानिकर नहीं होती। असमानता में उसके विनाश के बीज छिपे होते हैं। असमानता अधिक दिनों तक नहीं रहती। जहां केवल असमानता होती है, वहां दो बातें होती हैं। उससे असंतोष जन्म लेता है जो क्रांति का बीज होता है। दूसरे, यह त्रस्त लोगों को समान शत्रु और समान कष्ट के विरुद्ध संगठित कर देती है। लेकिन वर्गाश्रित असमानता की प्रकृति और परिस्थितियां कुछ ऐसी होती हैं जिसमें उक्त दोनों बातों में से किसी एक के भी होने की गुंजाइश नहीं होती। वर्गीकृत असमानता लोगों में अन्याय के विरुद्ध सामान्य असंतोष के पैदा होने में आड़े आती है। इसलिए यह क्रांति की प्रेरणा का आधार नहीं बन सकती। दूसरे, इस असमानता से त्रस्त लोग लाभ और हानि, दोनों ही मामलों में असमान होते हैं। इसलिए अन्याय के विरुद्ध सभी वर्गों के आमतौर पर एक-दूसरे के साथ संगठित होने की कोई संभावना नहीं होती। उदाहरणार्थ, विवाह के बारे में ब्राह्मणों के विवाह संबंधी नियम को लीजिए जो अन्याय से भरा हुआ है। ब्राह्मण का यह अधिकार कि वह अपने वर्ग से नीचे के वर्ग की लड़की तो ले सकता है लेकिन वह इन वर्गों को अपने वर्ग की लड़की नहीं देगा, अन्यायपूर्ण है। लेकिन इस अन्याय को समाप्त करने के लिए क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र परस्पर संगठित नहीं होंगे। क्षत्रिय ब्राह्मण के इस अधिकार के विरुद्ध कुढ़ता है, लेकिन वह दो कारणों से वैश्य या शूद्र के साथ संगठित नहीं होगा।