198 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पहला, वह तीनों वर्गों से लड़की लेने का ब्राह्मण के अधिकार से इसलिए संतुष्ट है कि उसे भी बाकी दो वर्गों से लड़की लेने का अधिकार मिला हुआ है। उसे उतना नुकसान नहीं होता है जितना बाकी दो वर्गों को होता है। दूसरे, अगर वह इस अन्यायपूर्ण विवाह-पद्धति के विरुद्ध आम आंदोलनकारियों के बीच जा खड़ा होता है। तब भले ही वह ब्राह्मणों के स्तर पर पहुंच जाए, लेकिन दूसरी ओर सभी वर्ग एक समान हो जाएंगे जिसका अर्थ यह होगा कि वैश्य और शूद्र उसके स्तर पर पहुंच जाएंगे, अर्थात् इस वर्ग के लोग क्षत्रियों की लड़कियां लेने लग जाएंगे, जिसका अर्थ यह है कि वह गिर कर उनके स्तर पर पहुंच जाएगा। आप अन्याय का कोई दूसरा उदाहरण लीजिए और उसके विरुद्ध आंदोलन के बारे में अनुमान लगाइए। यही सामाजिक मनःस्थिति यह स्पष्ट करेगी कि इस अन्याय के विरुद्ध विद्रोह एक असम्भव बात है।
ब्राह्मणवाद और उसके अन्याय के विरुद्ध क्यों नहीं हुआ, इसके कारणों में से एक कारण का आधार केवल वर्गीकृत असमानता का सिद्धांत है। यह लूट-खसोट में हिस्सा देने की प्रणाली है जिससे अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए समर्थक जुटाए जा सकें। यह घटिया दर्जे की चालाकी है जो आदमी अन्याय को बरकरार रखने और उससे अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए अब तक ईजाद कर सका है। यह और कुछ नहीं, अन्याय में अपना-अपना हिस्सा लेने के लिए लोगों को न्यौता देना है, जिससे कि वे सब लोग अन्याय के समर्थक बन जाएं।
ब्राह्मणवाद के इस नाटक के अंतिम अंक का पर्दा उठाना बाकी रह गया है।
ब्राह्मणवाद को प्राचीन वैदिक धर्म से चातुर्वर्ण्य पद्धति दाय के रूप में प्राप्त हुई थी। चातुर्वर्ण्य पद्धति, जिसे हिंदू अपने आर्य पूर्वजों की अद्वितीय सृष्टि मानते हैं, किसी भी अर्थ में ऐसी नहीं है। इसमें कोई भी मौलिकता नहीं है। यह संपूर्ण प्राचीन विश्व में व्याप्त थी। वह मिस्र के निवासियों में थी और प्राचीन फारस के लोगों में भी थी। प्लेटो इसकी उत्कृष्टता से इतना अभिभूत था कि उसने इसे सामाजिक संगठन का आदर्श रूप कहा था। चातुर्वर्ण्य का आदर्श त्रुटिपूर्ण है। कुछेक व्यक्तियों को एक में मिलाकर उनका एक अलग-अलग वर्ग बनाना मनुष्य और उसकी शक्तियों को जैसे बाहर-बाहर देखना है। प्राचीन आर्यों ने और प्लेटो ने भी हर व्यक्ति की विलक्षणता, दूसरों के साथ अतुलनीयता और हर व्यक्ति अपने आप में एक पृथक वर्ग है, इसकी कोई कल्पना नहीं की थी। उन्होंने इस पर विचार नहीं किया कि व्यक्ति की प्रवृत्तियां अनंत होती हैं और एक व्यक्ति में भी कई तरह की प्रवृत्तियां होती हैं। उन्होंने प्रतिभा या शक्ति के प्रकार के आधार पर व्यक्ति को वर्गीकृत किया। स्पष्टतः यह गलत है। आधुनिक विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि कुछेक व्यक्तियों को मिलाकर और उनके अलग-अलग वर्ग बनाकर प्रत्येक को कुछ खास क्षेत्रों में निहित कर देने से व्यक्ति और समाज, दोनों के