7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 214

ब्राह्मणवाद की विजय

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प्रति अन्याय होता है। वर्ग और व्यवसाय के आधार पर समाज को स्तरों में विभाजित करने से समाज की क्षमता का पूर्ण उपयोग, जो प्रगति के लिए आवश्यक है, नहीं होता और यह व्यक्ति की सुरक्षा के साथ-साथ सामान्यतः समाज के कल्याण और उसकी सुरक्षा के लिए भी असंगत है। ख्1,

प्राचीन हिंदुओं और प्लेटो ने एक और गलती की। संभवतः इस बात में कुछ सच्चाई हो कि जिस तरह कीड़े-मकोड़ों में द्विरूपता या बहुरूपता पाई जाती है, उसी तरह यह विशेषता मनुष्यों में भी है यद्यपि इनमें यह केवल मनोवैज्ञानिक रूप में ही मिलती है। अभी हम यह मान लें कि मनुष्यों में मनोवैज्ञानिक द्विरूपता या बहुरूपता है तो भी इनको वर्गों में इस प्रकार बांटना कि अमुक तो अमुक कार्य करने के लिए और अमुक कोई दूसरा ही कार्य करने के लिए पैदा हुआ है, कुछ शासन करने, अर्थात् स्वामी बनने और कुछ आज्ञा का पालन करने अर्थात् दास बनने के लिए पैदा हुए हैं। यह अनुमान करना भी गलत है कि किसी विशिष्ट व्यक्ति में कुछ गुण हैं और अन्य में इनका अभाव है। बल्कि सच तो यह है कि प्रत्येक व्यक्ति में सभी गुण होते हैं और यह सच उस बात से नकारा नहीं जा सकता। कुछ प्रवृत्ति इस सीमा तक प्रबल हो जाती है कि उसके अलावा कोई दूसरी प्रवृत्ति नहीं दिखाई पड़ती।

हमने अक्सर देखा है कि मनुष्य में किसी एक क्षण में उसकी जो प्रवृत्ति प्रधान होती है, वह उस प्रवृत्ति से भिन्न या उस प्रवृत्ति की बिल्कुल ही उल्टी होती है जो उसी मनुष्य में किसी क्षण प्रधान थी। प्रो. बर्गसां ‘‘मनुष्य ख्2, और ‘दास’ के संबंध में नीत्शे की झूठी प्रतिस्थापना के बारे में लिखते हुए कहते हैंः हमने क्रांति के दिनों में इस (झूठ) को बेनकाब होते देखा है। सीधे-सादे नागरिक, जो उस क्षण तक विनम्र और आज्ञाकारी थे, लोगों का नेतृत्व करने के लिए एक दिन जाग उठते हैं।’’ मुसोलिनी और हिटलर का चरित्र आर्यों के और प्लेटो के भी सिद्धांत झुठला देता है।

चातुर्वर्ण्य की बौद्धिक प्रणाली एक आदर्श बनने के बजाए उन परिवर्तनों से और भी बदतर हो गई जो ब्राह्मणों ने किए। इन परिवर्तनों का वर्णन किया जा चुका है। निस्संदेह इनमें हर परिवर्तन कुटिलतापूर्ण था। भिक्षुओं का बौद्ध संघ और ब्राह्मणों की वैदिक प्रणाली एक समान उद्देश्य के लिए बनी थी। उन्होंने समाज में विशिष्ट वर्ग का निर्माण किया जिसका काम समाज को सही रास्ते पर ले जाना था। हालांकि बौद्ध भिक्षु से वही काम अपेक्षित था जो ब्राह्मण से था, तो भी वह अपेक्षाकृत अधिक अच्छी स्थिति में था। इसका कारण यह है कि बुद्ध ने जो एक शर्त निर्धारित की उनसे पहले

  1. इस विषय पर और अधिक चर्चा के लिए हिंदी के खंड 1 में ‘जातिप्रथा-उन्मूलन’ शीर्षक मेरा लेख

देखिए।

  1. टू सोर्सेज ऑफ मोरेलिटी, (होल्ट), पृ. 267