200 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
या उनके बाद किसी ने नहीं किया था। बुद्ध ने यह आवश्यक समझा कि समाज को सही रास्ता दिखाने वाले और उसके विश्वसनीय मार्गदर्शक व्यक्ति को मानसिक दृष्टि से स्वतंत्र होना चाहिए और जो बात अधिक महत्वपूर्ण है, वह यह कि उसकी कोई निजी संपत्ति नहीं होनी चाहिए। यदि उसके ऊपर निजी संपत्ति का दायित्व है, तब वह सही रास्ते से समाज का नेतृत्व करने और उसका मार्गदर्शन करने के कर्तव्य को पूरा करने में अवश्य असफल होगा। बुद्ध ने इसलिए सतर्क हो भिक्षुकों की आचरण-संहिता में एक नियम यह रखा कि भिक्षुक के लिए निजी संपत्ति का होना निषिद्ध है। ब्राह्मणों की वैदिक प्रणाली में इस प्रकार का कोई निषेध नहीं था। ब्राह्मण निजी संपत्ति रखने के लिए स्वतंत्र था। इस अंतर ने बौद्ध भिक्षु और वैदिक ब्राह्मण के आचरण और दृष्टिकोण में गहरा अंतर ला दिया। भिक्षुओं का वर्ग बौद्धिक बन गया। दूसरी ओर ब्राह्मणों का वर्ग शिक्षितों का वर्ग बन गया। बौद्धिक वर्ग और शिक्षित वर्ग में बड़ा भेद होता है। किसी वर्ग या किसी काम से जुड़ने के कारण उस पर कोई बंदिश नहीं होती। दूसरी ओर, शिक्षित वर्ग कोई बौद्धिक वर्ग नहीं होता, हालांकि उसमें तर्क करने, समझने और सोचने की अपनी शक्ति होती है। इसका कारण यह है कि शिक्षित वर्ग की दृष्टि का आयाम और नई विचारधारा के प्रति उसका रवैया उस वर्ग के हित में नियंत्रित होता है जिससे वह पहले से ही जुड़ा होता है।
इसलिए ब्राह्मण शुरू से ही केवल शिक्षित वर्ग रहा जिसके पास बुद्धि तो थी, लेकिन वह स्वार्थ-प्रेरित थी। ब्राह्मणों की इस वैदिक प्रणाली में यह दोष पुरानी वैदिक प्रणाली में किए गए परिवर्तनों के कारण चरम सीमा तक पहुंच गया। शासन करने के अधिकार और अन्य विशेषाधिकारों ने ब्राह्मणों को और अधिक स्वार्थी बना दिया और उनमें ऐसी प्रेरणा भर दी कि वे अपनी शिक्षा का उपयोग ज्ञान की संवृद्धि के लिए न कर, अपने समुदाय के उपयोग के लिए और समाज की उन्नति के विरुद्ध करने लगे।
उनकी समस्त शक्ति और उनकी शिक्षा जनता के हित के बजाए अपने ही विशेषाधिकारों को बरकरार रखने पर खर्च हुई। अधिकांश हिंदू लेखकों का यह दावा रहा है कि भारत की सभ्यता विश्व में प्राचीनतम सभ्यता है। वह इसी बात पर जोर देंगे कि ज्ञान की कोई ऐसी शाखा नहीं है जिसमें उनके पूर्वज अग्रणी नहीं थे। आप प्रो. विनय कुमार सरकार की दि पोजिटिव बैकग्राउंड ऑफ हिंदू सोशियोलोजी या डॉ. बृजेन्द्र नाथ शील की दि पोजिटिव साइंसेज ऑफ दि एनसिएंट हिंदूइज्म जैसी कोई भी पुस्तक लीजिए। उन्होंने विभिन्न वैज्ञानिक विषयों में पूर्वजों के ज्ञान के बारे में जो आंकड़े दिए हैं, उनसे हर कोई चमत्कृत हो जाता है। इन पुस्तकों से यह पता चलेगा कि प्राचीन भारतवासी
खगोल विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, जीव-विज्ञान, रसायन विज्ञान, गणित, चिकित्सा, खनिज विज्ञान, भौतिक विज्ञान और यहां तक कि जैसा कि बहुत से लोगों का विश्वास है