7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 216

ब्राह्मणवाद की विजय

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विमानन भी जानते थे। हो सकता है कि यह सब कुछ बहुत सच हो। अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि प्राचीन भारतीयों ने इन प्रत्यक्ष विज्ञानों की खोज कैसे की। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि प्राचीन भारतीयों ने उन विज्ञानों में कोई प्रगति क्यों नहीं की जिनमें वे अग्रणी थे? प्राचीन भारत में विज्ञान की प्रगति अचानक अवरुद्ध क्यों हो गई और इस बात पर जितना आश्चर्य होता है, उतना ही खेद होता है। विज्ञान की दुनिया में भारत का स्थान है। यह स्थान आदिम देशों में भले ही पहला हो, लेकिन सभ्य देशों में अंतिम है। यह कैसे हुआ कि जिस देश ने विज्ञान में प्रगति करनी शुरू की, वह क्योंकर प्रगति करते-करते रह गया, रास्ते में रुक गया और उसने उसे प्रारंभिक अवस्था में और अपूर्ण छोड़ दिया? यह एक ऐसा प्रश्न है, जिस पर विचार करना और जिसका उत्तर दिया जाना आवश्यक है, न कि यह कि प्राचीन भारतीय क्या-क्या जानते थे।

इस प्रश्न का केवल एक उत्तर है और यह बहुत ही आसान है। प्राचीन भारत में केवल ब्राह्मण शिक्षित वर्ग होता था। यही वह वर्ग था, जो अन्य सभी वर्गों से उच्च होने का दावा करता था। बुद्ध ने ब्राह्मणों की उच्चता के दावे का विरोध किया और उनके विरुद्ध संघर्ष किया था। ब्राह्मणों ने बौद्धिक वर्ग से भिन्न एक शिक्षित वर्ग के रूप में वैसा ही कार्य किया, जैसा शिक्षित वर्ग करता है। इसने ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में काम करना छोड़ दिया और अपनी उच्चता के दावे की रक्षा करने और अपने वर्ग के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक हितों की रक्षा करने में जुट गया। विज्ञान पर पुस्तकें लिखने के बजाए, ब्राह्मणों ने स्मृतियां लिखने का काम हाथ में ले लिया। भारत में विज्ञान की प्रगति के रुक जाने का यही कारण है। सामाजिक समानता के बौद्ध सिद्धांत का प्रतिरोध करने के लिए ब्राह्मणों ने स्मृतियां लिखना अधिक महत्वपूर्ण और अधिक आवश्यक समझा।

ब्राह्मणों ने कितनी स्मृतियां लिखीं?

श्री काणे ने, जो स्मृति साहित्य के बहुत बड़े मर्मज्ञ हैं इनकी संख्या 128 बताई है। ये किसलिए? स्मृतियां नियम-पुस्तक कहलाती हैं, किंतु इन पुस्तकों की विषयवस्तु कुछ और है। ये वस्तुतः टीकाएं हैं, जिनमें ब्राह्मणों की सर्वोच्चता और उनके विशेषाधिकारों की व्याख्या की गई है। ब्राह्मणवाद की रक्षा करना विज्ञापन की प्रगति से अधिक महत्त्वपूर्ण था। ब्राह्मणवाद ने अपने विशेषाधिकारों की रक्षा नहीं की, बल्कि इन विशेषाधिकारों का आगे इस प्रकार विस्तार किया कि कोई भी सभ्य व्यक्ति लज्जित हुए बिना नहीं रहेगा। ब्राह्मणों ने विशेष रूप से कुछ ऐसे विशेषाधिकारों का विस्तार करना शुरू किया, जो उनके लिए मनु ने स्वीकृत किए थे।

मनु ने ब्राह्मणों को दान प्राप्त करने का अधिकार दिया है। यह हमेशा धन या चल संपत्ति के रूप में होता था। लेकिन कुछ समय बाद दान की अवधारणा का विस्तार