7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 217

202 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किया गया, जिससे स्त्री-दान भी शामिल किया जा सके और जिसे ब्राह्मण अपनी स्त्री के रूप में रख सकें या जिसे ब्राह्मण धन लेकर वापस कर सकें। ख्1,

मनु ने ब्राह्मणों को भू-देव अर्थात् पृथ्वी के देवता की संज्ञा दी है। ब्राह्मणों ने इस कथन को व्यापक बनाया और वे अन्य वर्गों की स्त्रियों के साथ संभोग करना अपना अधिकार समझने लगे। रानियां-महारानियां भी इस अधिकार से न बच सकीं। लुडोविको डि वर्थेमा ने, जो भारत में सन् 1502 के आसपास यात्री के रूप में आया था, कालीकट के ब्राह्मणों के विषय में निम्नलिखित वृत्तान्त लिखा हैः

फ्ये जानना उचित है कि ये ब्राह्मण कौन हैं। इनका यहां के धर्म में वही स्थान है जो हमारे यहां पादरियों का है। जब राजा विवाह करता है, तब वह इन ब्राह्मणों में सबसे अधिक योग्य और सबसे अधिक पूजित ब्राह्मण को चुनता है और उससे अपनी पत्नी के साथ पहली रात सोने का आग्रह करता है ताकि वह उसके कौमार्य को भंग कर सकें’’। ख्2,

इसी प्रकार एक दूसरा लेखक हैमिल्टन ख्3, लिखता हैः

फ्जब सैमोरिन विवाह करे तब उसे तब तक अपनी पत्नी के साथ संभोग न करना चाहिए जब तक नम्बूद्री (नम्बूद्री ब्राह्मण) या प्रधान पुरोहित उसके साथ संभोग न कर ले और यह पुरोहित यदि चाहे तो उसके साथ तीन रात तक सहवास कर सकता है, क्योंकि उस स्त्री की पहली संतान उस देवता का नैवेद्य होनी चाहिए, जिसकी वह आराधना करती थी।य्

बंबई प्रेसिडेंसी में वैष्णव संप्रदाय के पुरोहितों ने यह दावा किया कि उन्हें अपने संप्रदाय की स्त्रियों के साथ उनके विवाह की पहली रात संभोग करने का अधिकार है। यह मामला सन् 1869 में बंबई उच्च न्यायालय में किन्हीं करसोनदास मुलजी के विरुद्ध इस संप्रदाय के प्रधान पुरोहित द्वारा दायर किए गए महाराजा मानहानि मुकदमे की सुनवाई के वक्त उठा था। इससे पता चलता है कि इस समय तक पहली रात का लाभ उठाने का अधिकार अमल में था।

अगर पहली रात का संभोग करने का अधिकार निचले वर्ग पर लागू किया जा सकता था तो ब्राह्मण इसका विस्तार करने से नहीं चूके। उन्होंने खासतौर से यह मलाबार

  1. मुझे एक ऐसे केस की रिपोर्ट पढ़ने के लिए मिली जिसमें एक ब्राह्मण ने जिसे एक विवाहित स्त्री दान

के रूप में मिली और जिसने उस स्त्री के पति द्वारा धन देने पर भी उसे वापस करना अस्वीकार कर

दिया था।

  1. दि ट्रैवल्स ऑफ लुडोविको डि वर्थेमा (प्रकाशक हृकयट सोसायटी), पृ. 141_ वर्थेमा आगे लिखते हैं,

‘आप यह मत समझिए कि ब्राह्मण स्वेच्छया यह काम करने जाता है। राजा को उसे चार सौ या पांच

सौ डुकैट देना पड़ता है।’

  1. ए न्यू एकाउंट ऑफ दि ईस्ट इंडीज (1744), खंड 1, पृ. 310