ब्राह्मणवाद की विजय
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में किया। मनु ने ब्राह्मणों को भू-देव, पृथ्वी के स्वामी की संज्ञा दी थी। ब्राह्मणों ने इस कथन को व्यापक बनाया और अन्य वर्गों की स्त्रियों के साथ स्वच्छंद होकर संभोग करने का अधिकार जताने लगे। यह खासतौर से मलाबार में हुआ। वहां- ख्1,
फ्ब्राह्मण जातियां मक्त्यम पद्धति का अनुसरण करती हैं, अर्थात् वह पद्धति जिसके अनुसार बच्चा अपने पिता के परिवार का होता है। जातियां अपनी ही जाति में विवाह करती हैं और सभी कानूनी और धार्मिक प्रतिबंधों और अधिकारों का पालन करती हैं। लेकिन ब्राह्मण पुरुष अक्सर निचली जाति की स्त्रियों के साथ भी विवाह (संबंधन) करते हैं।य्
केवल इतना ही नहीं है। जरा और देखिए, लेखक आगे क्या लिखता हैः
फ्इस विवाह (संबंधन) में कोई भी पक्ष दूसरे परिवार का सदस्य नहीं हो जाता और पति-पत्नी से उत्पन्न बच्चा मां के परिवार का कहलाता है। जहां तक कानून की बात है, इस बच्चे का अपने पिता की संपत्ति का अंश या उससे अपने पालन-पोषण के लिए
खर्च प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं होता।य्
इस प्रथा के उद्भव के बारे में गजेटियर के लेखक का कहना है कि इस प्रथा का जन्मः
फ्भू-देवों या (पृथ्वी के देवताओं) अर्थात् (ब्राह्मणों) और उसके बाद निचले वर्ग, अर्थात्
क्षत्रियों का शासक वर्ग का यह अधिकार इस दावे से सिद्ध होता है कि निचली जाति
की स्त्री अपने विवाह के बाद नजराने के रूप में सुहागरात उनके साथ मनाएगी। यह
अधिकार यूरोप में सामंत या जागीरदार के तथाकथित इस अधिकार के समान है कि
उसके आसामी की बहू विवाह के बाद उसके साथ अपनी सुहागरात मनाएगी।य्
यदि यह कहा जाए कि सिर्फ नजराना लेने का अधिकार है जिसे यूरोप में ‘पहली रात का नजराना’ कहा जाता था, तो कुछ कम होगा। यह उससे अधिक है। यह निचली जाति पर ब्राह्मण का आम अधिकार होता है कि वह अपनी यौन पिपासा को बुझाने के लिए उस जाति की किसी भी स्त्री के साथ वैश्यावृत्ति कर सकता है और उस पर उससे विवाह करने की कोई जिम्मेदारी नहीं है।
ये वे अधिकार थे, जो आध्यात्म के उपदेशकों ने सामान्य जनता में अपने लिए सुनिश्चित किए। इतिहास में बोर्गीज के पोप लोगों को आध्यात्म के उपदेशकों की जाति में सबसे अधिक चरित्र-भ्रष्ट जाति कहा गया है, जिन्होंने पीटर के राज-सिंहासन को अपने अधीन किया था। कोई पूछ सकता है कि क्या वे लोग वास्तव में भारत के ब्राह्मणों से अधिक निकृष्ट थे?
- गजेटियर ऑफ मलाबार एंड एंजेंगो डिस्ट्रिक्ट, सी.ए.ईन्स, खंड 1, पृ. 95