7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 219

204 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बुद्ध ने एक शुद्ध वर्ग की कल्पना की थी, जो मुक्त होकर कल्याण की कामना करेगा और जिसका किसी वर्ग के हित में कोई स्वार्थ नहीं होगा। ऐसी कल्पना कहीं और नहीं मिलती। अभी कुछ दिनों तक लोग यही मानते आए हैं कि बौद्धिक चिंतन में लगे रहने वाले व्यक्ति की स्वतंत्रता उसकी निजी संपत्ति होने से सीमित हो जाती है। इस कारण बौद्धिक वर्ग को जो अभाव हो जाता है, उसकी पूर्ति अन्य देशों में कुछ इस प्रकार की गई है कि वहां समाज के हर स्तर का अपना एक शिक्षित वर्ग होता है। वहां समाज के विभिन्न स्तरों के शिक्षित वर्गों द्वारा विभिन्न प्रकार के मत व्यक्त किए जाते हैं। इससे हालांकि कोई निश्चित मार्गदर्शन नहीं मिलता तो भी सुरक्षा रहती है। इतने ढेर सारे विचारों के व्यक्त होते रहने से समाज को एक ही वर्ग के शिक्षित समुदाय के विचारों द्वारा मार्गदर्शन करने का भय नहीं रहता, क्योंकि वह वर्ग देश के हित की अपेक्षा स्वभावतः अपने ही वर्ग के हितों को सर्वोपरि मानता है। लेकिन ब्राह्मणवाद द्वारा जो परिवर्तन किए गए, उससे बौद्धिक वर्ग का सुरक्षित और सटीक मार्गदर्शन समाप्त हो गया। इससे भी ज्यादा बुरी बात यह हुई कि हिंदू अभय और सुरक्षित नहीं रह गए, क्योंकि वहां समाज के विभिन्न विचारों का वैविध्य नहीं रह गया।

ब्राह्मणों ने शूद्रों को शिक्षा से वंचित कर, क्षत्रियों को सेना के काम में लगाकर और वैश्यों को व्यापार की ओर प्रेरित कर और शिक्षा को अपने लिए सुरक्षित कर केवल स्वयं को शिक्षित वर्ग के रूप में संगठित किया। वे सारे समाज को गलत दिशा में मोड़ने और उसका गलत मार्गदर्शन करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र हो गए। वर्ण को जाति में परिवर्तित कर उन्होंने यह घोषित कर दिया कि मनुष्य की योग्यता का वास्तविक और अंतिम मानदंड यह है कि वह किस जाति में पैदा हुआ है। जाति और वर्गीकृत असमानता से फूट और वैमनस्य एक आम बात हो गई।

अगर मूल वर्ग पद्धति का यह विकृतीकरण केवल सामाजिक व्यवहार तक सीमित रहता, तब तक तो सहन हो सकता था। लेकिन ब्राह्मण धर्म इतना कर चुकने के बाद भी संतुष्ट नहीं रहा। उसने इस चातुर्वर्ण्य पद्धति के परिवर्तित पद्धति मनुस्मृति में व्यक्ति और गृहस्थ के धर्म के रूप में उपलब्ध है। इनमें किसी को कोई संदेह नहीं हो सकता।

मनु ने यह विधान किया कि अगर निचली जाति का कोई व्यक्ति अपने को उच्च जाति के स्तर का होने या उच्च जाति का होने की अनधिकार चेष्टा करता है, तब वह अपराध माना जाएगा।

10.96. निचली जाति का कोई व्यक्ति यदि लोभवश ऊंची जातिवाले व्यक्ति के

व्यवसाय को अपनाकर जीवन यापन करता है तब राजा उसकी संपत्ति छीन ले तथा

उसे निर्वासित कर दे।