ब्राह्मणवाद की विजय
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11.56. असत्य रूप में अपने को ऊंचे कुल में जन्मा बताना, राजा को (किसी
अपराध के बारे में) सूचना देना और अपने गुरु की झूठी निंदा करना (ऐसे अपराध
हैं जो) किसी ब्राह्मण की हत्या करने के समान हैं।
यहां दो अपराधों का वर्णन है, सामान्य छद्म व्यक्तिता (रूप धारण करना, 10.96) और शूद्र द्वारा छद्म व्यक्तिता। कृपया यह देखिए, कितना भयंकर दंड है। पहले अपराध के लिए दंड है संपत्ति का छीन लिया जाना और निर्वासन। दूसरे अपराध के लिए वही दंड है जो किसी ब्राह्मण की मृत्यु का कारण बनने के लिए है।
आधुनिक न्याय व्यवस्था में छद्म व्यक्तिता का अपराध जाना-पहचाना अपराध है। भारतीय दंड-संहिता की धारा 419 इसी के बारे में है। लेकिन भारतीय दंड-संहिता छद्म व्यक्तिता के लिए क्या दंड देती है? जुर्माना, और अगर कैद तो तीन साल की, या दोनों। मनु अपने जाति वाले कानून को अंग्रेज सरकार द्वारा इतना हल्का बना दिए जाने पर स्वर्ग में जरूर अपना सिर धुन रहा होगा।
मनु इसके बाद राजा को निर्देश देता है कि उसे इस नियम को कार्यान्वित करना चाहिए। पहले, वह राजा से उसे उसके पवित्र कर्तव्य की साक्षी देते हुए अपील करता हैः
8.172. जातियों के एक-दूसरे में विलय को रोकने से राजा की शक्ति बढ़ती है
और वह उस जीवन में और मृत्यु के बाद समृद्धिवान होता है।
मनु संभवतः जानता था कि वर्णों के परस्पर विलय से संबंधित नियम राजा को संभवतः रुचिकर न हो और वह इसे कार्यान्वित न करे। इसलिए मनु राजा को यह बताता है कि नियमों को कार्यान्वित करने के संबंध में उसे किस प्रकार का आचरण करना चाहिए।
8.177. इसलिए राजा को अपनी रुचि या अरुचि पर ध्यान नहीं देना चाहिए तथा
ठीक यम की तरह व्यवहार करना चाहिए, अर्थात् उसे उसी तरह पक्षपात रहित होना
चाहिए जिस प्रकार यम, मृत्यु का न्यायकर्ता होता है।
मनु, तथापि इसे राजा के पवित्र कर्तव्य के सहारे नहीं छोड़ देना चाहता। मनु इसे राजा के लिए अनिवार्य कर देता है। तदनुसार मनु इसे दायित्व घोषित करता हैः
8.410. राजा को वैश्य को व्यापार करने, रुपया सूद पर देने, कृषि करने, पशु उधार
देने और शूद्र को द्विजों की सेवा करने का आदेश देना चाहिए।
मनु इस विषय पर आगे प्रकाश डालता हैः