206 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
8.418. राजा सावधानीपूर्वक वैश्यों और शूद्रों को अपना-अपना कर्तव्य (जो उनके
लिए निर्धारित है) करने के लिए बाध्य करे, क्योंकि यदि वे अपने कर्तव्य से विरत
होते हैं तो वे इस समस्त संसार को अस्त-व्यस्त कर डालेंगे।
अगर राजा अपने इस दायित्व को पूरा न करे, तब क्या होगा? मनु की दृष्टि में चातुर्वर्ण्य के इस नियम की सत्ता इतनी परम है कि वह उस राजा के सामने झुकने को तैयार नहीं है जो इस नियम को कार्यान्वित करने के बारे में अपने दायित्व को पूरा नहीं करता। वह दृढ़प्रतिज्ञ हो, एक नए नियम का सृजन कर देता है कि ऐसे राजा को राज-सिंहासन से च्युत कर दिया जाएगा। इससे हम कल्पना कर सकते हैं कि चातुर्वर्ण्य की पद्धति मनु को कितनी प्रिय थी।
जैसा कि मैंने कहा है, चातुर्वर्ण्य की वैदिक पद्धति जाति-व्यवस्था की अपेक्षा उत्तम थी। लेकिन यह पद्धति ऐसे समाज के सृजन के पक्ष में नहीं थी, जिसे एक पूरा समाज कहा जा सके, जहां आदर्श समाज में मिलने वाली एकता हो। चातुर्वर्ण्य सिद्धांत में ही चार वर्गों का जन्म हुआ। इन चार वर्गों का आपस में कोई मैत्रीभाव नहीं था। ये आपस में झगड़ते थे और ये झगड़े कभी-कभी इतने कटु हो जाते थे कि वे वर्गयुद्ध का रूप ले लेते। फिर भी, प्राचीन चातुर्वर्ण्य पद्धति में दो अच्छाइयां थीं, जिन्हें ब्राह्मणवाद ने स्वार्थ में अंधे होकर निकाल दिया। पहली, वर्णों की आपस में एक-दूसरे से पृथक स्थिति नहीं थी। एक वर्ण का दूसरे वर्ण में विवाह, और एक वर्ण का दूसरे वर्ण के साथ भोजन, दो बातें ऐसी थीं जो एक-दूसरे को आपस में जोड़े रखती थीं। विभिन्न वर्णों में असामाजिक भावना के पैदा होने के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी, जो समाज के आधार को ही समाप्त कर देती है। हालांकि क्षत्रिय ब्राह्मणों के, और ब्राह्मण क्षत्रियों के विरुद्ध लड़ते थे तो भी ऐसे क्षत्रियों ख्1, की कमी नहीं थी जो ब्राह्मण के लिए क्षत्रियों के विरुद्ध लड़े हों और इसी प्रकार ऐसे ब्राह्मणों ख्2, की भी कमी नहीं थी, जिन्होंने क्षत्रियों से मिलकर ब्राह्मणों को न दबाया हो।
दूसरी बात यह है कि चातुर्वर्ण्य व्यवस्था रूढि़गत थी। यह समाज का आदर्श थी, लेकिन यह शासन का नियम नहीं थी। ब्राह्मणवाद ने वर्णों को अलग-अलग कर दिया और उनकी एक-दूसरे से पृथक स्थिति हो गई। उसने परस्पर बैर के बीज बो दिए। जो रूढि़गत था, ब्राह्मणवाद ने उसे नियम बना दिया। इस नियम का आधार बनाकर उसने दुष्कृत्य कर डाला। यदि वैदिक चातुर्वर्ण्य व्यवस्था हानिकर थी, तब वह काल और परिस्थितियों के आघात से स्वतः मिट जाती। ब्राह्मणवाद ने इसे नियम का रूप प्रदान
- क्षत्रियों के विरुद्ध परशुराम के युद्धों की कहानी के बारे में यह मेरी व्याख्या है।
- बौद्ध धर्म ब्राह्मणों और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध एक विद्रोह था। तो भी प्रारंभ में बुद्ध और बौद्ध धर्म के
अधिकांश अनुयायी ब्राह्मण थे।