ब्राह्मणवाद की विजय
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कर शाश्वत बना दिया। संभवतः यह सबसे महान कुकृत्य था, जो ब्राह्मणवाद ने हिंदू समाज के प्रति किया।
इस प्रश्न पर विचार करते समय हर व्यक्ति के ध्यान में यह बात आती है कि चातुर्वर्ण्य के नियम को, जो वर्गीकृत असमानता का एक दूसरा रूप हैं, कार्यान्वित करने का जो दायित्व राजा को सौंपा गया है, उसका अभिप्राय यह नहीं कि राजा इस नियम को ब्राह्मणों और क्षत्रियों पर भी लागू करे। यह दायित्व इस नियम को वैश्यों और शूद्रों पर लागू करने तक सीमित है। इस बात को ध्यान में रखने के बाद कि ब्राह्मणवाद इस पद्धति को नियम का रूप देने के बारे में दृढ़संकल्प था, यह कहला कोई अधिक अनुचित नहीं कि इसके परिणाम बड़े ही भयावह रहे। इस व्यवस्था को नियम बनाने की इन कोशिशों के बावजूद यह व्यवस्था आधी रूढि़गत रही और आधी ही नियम बनी। वह वैश्यों और शूद्रों के लिए नियम बन गई और ब्राह्मणों और क्षत्रियों के संबंध में केवल रूढि़गत रही।
इस अंतर को स्पष्ट करना आवश्यक है। क्या ब्राह्मणवाद इस व्यवस्था को नियम का रूप देने में कपटरहित था? क्या उसका यह अभिप्राय था कि चारों वर्णों में से प्रत्येक वर्ण पर यह नियम लागू हो? तथा तथ्य कि ब्राह्मणवाद ने अपने बनाए इस नियम को ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए अनिवार्य नहीं किया, इस बात को सिद्ध करता है कि ब्राह्मणवाद पूरी तरह निष्कपट नहीं था। यदि उसे यह विश्वास था कि यह एक आदर्श व्यवस्था है, तो वह इसे सभी पर लागू करने में कोई कोर-कसर न उठा रखता।
इस कूट-कर्म में कपट के अतिरिक्त कुछ और भी है। हम यह समझ सकते हैं कि ब्राह्मणों को उस नियम से क्योंकर मुक्त और अनियंत्रित रखा गया। मनु ने उन्हें पृथ्वी के देवता कहा और देवता तो नियम के ऊपर होते हैं। लेकिन ब्राह्मण को जिस प्रकार मुक्त रखा गया, उस प्रकार क्षत्रियों को क्यों मुक्त रखा गया? वह जानते थे कि क्षत्रिय ब्राह्मणों के सम्मुख अपना सिर नहीं झुकाएंगे। इसलिए वह क्षत्रियों को चेतावनी देते हैं कि अगर वे उद्धृत होते हैं और विद्रोह की योजना बनाते हैं तो ब्राह्मण उनको किस प्रकार दंडित कर सकते हैं।
9.320. जब क्षत्रिय किसी भी प्रकार ब्राह्मणों के प्रति निरंकुश हो जाएं तो ब्राह्मण स्वयं उसे विधिवत कर सकते हैं, क्योंकि क्षत्रिय ब्राह्मणों से उत्पन्न हुए हैं।
9.321. जल से अग्नि, ब्राह्मणों से क्षत्रिय, पत्थर से लोहा उत्पन्न हुए हैं। इन (तीनों) की बेधन शक्ति का उस पर कोई प्रभाव नहीं होता, जहां से ये उत्पन्न हुई।
हम यह कह सकते हैं कि मनु क्षत्रिय पर नियम लागू करने का दायित्व राजा को इसलिए नहीं सौंपता कि ब्राह्मणों ने यह अनुभव किया कि वे अपनी शक्ति से और राजा की सहायता के बिना क्षत्रियों से निबट सकते हैं और जब समय आएगा, परिणाम के