7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 223

208 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विषय में चिंता किए बिना वे क्षत्रियों का निषेध कर सकते हैं। मनु एकाएक शांत हो जाता है और क्षत्रियों से सहयोग करने और ब्राह्मणों के साथ मिलकर एक मिला-जुला मोर्चा बनाने की वकालत करने लगता है। जिस श्लोक में मनु क्षत्रियों के विरुद्ध गर्जन-तर्जन और अभिशाप आदि की चर्चा करता है, उसके आगे के श्लोक में वह कहता हैः

9.323. लेकिन (जो राजा यह अनुभव करता है कि उसका अंत निकट है), वह अपनी समस्त संपत्ति जो उसने अर्थ दंड लगाकर संग्रहीत की ब्राह्मणों को सौंप दे। अपना राज्य अपने पुत्र को सौंप दे तथा युद्ध में मृत्यु का वरण करे।

अभिशाप के बाद अनुनय-विनय के स्वर विचित्र अलाप लगते हैं। क्षत्रियों के विरुद्ध आचार-व्यवहार में इस नरमी की वजह क्या है? ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच इस सहयोग का उद्देश्य क्या है? यह मोर्चा किसके विरुद्ध बनाया जा रहा है? मनु इसे स्पष्ट नहीं करता। इस पहेली को सुलझाने और प्रश्नों का संतोषप्रद रीति से उत्तर देने के पहले एक हजार वर्ष का संपूर्ण इतिहास बताया जाना चाहिए।

जो इतिहास इस पहेली के समाधान की कुंजी प्रदान करता है, वह ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच वर्ग-युद्धों का इतिहास है।

अधिकांश रूढि़वादी हिंदू वर्ग-युद्ध के उस इतिहास का विरोध करते हैं, जिसका प्रतिपादन कार्ल मार्क्स ने किया था और अगर उनसे यह कहा जाए कि मार्क्स अपने सिद्धांत की पुष्टि करने के लिए जो अकाट्य साक्ष्य खोज रहा था, वह संभवतः उनके अपने पूर्वजों के इतिहास में ही मिल जाएं तो वे अवश्य भौंचक्के रह जाएंगे। निश्चय ही ब्राह्मणों और क्षत्रियों में अनेक वर्ग जुड़ गए और प्राचीन हिंदू साहित्य में उन्हीं का उल्लेख ख्1, किया गया है, जो अत्यंत महत्वपूर्ण थे। हमें ब्राह्मणों और राजाओं के बीच जो सभी क्षत्रिय थे, युद्धों के वृत्त उपलब्ध हैं। इनमें पहला युद्ध राजा वेण के साथ, दूसरा पुरुरवा के साथ, तीसरा नहुष के साथ, चौथा निमि के साथ और पांचवां सुमुख के साथ हुआ। हमें वशिष्ठ नामक ब्राह्मण और विश्वामित्र के बीच, जो साधारण क्षत्रिय थे राजा नहीं थे, हुए युद्ध का भी वर्णन मिलता है। हम कृतवीर्य के क्षत्रिय वंशजों द्वारा भृगु गोत्र के ब्राह्मणों का सामूहिक हत्या का वृत्तांत भी जानते हैं। इसके बाद हमें ब्राह्मणों के प्रतिनिधि के रूप में समस्त क्षत्रिय जाति का समूल नष्ट करने का वृत्तांत भी उपलब्ध है। ये युद्ध जिन विषयों को लेकर हुए, वे काफी व्यापक हैं। इनसे पता चलता है कि ब्राह्मणों और क्षत्रियों में परस्पर कितनी कटुता थी। ऐसे भी युद्धों का वर्णन मिलता है जो इसी बात को लेकर हुए कि क्या क्षत्रिय को ब्राह्मण बनने का अधिकार है। इस प्रश्न को लेकर भी युद्ध हुए कि ब्राह्मण सत्ता के अधीन है अथवा नहीं। इस प्रश्न को लेकर

  1. यह सारा वृत्त प्रो. म्यूर ने अपनी पुस्तक ओरिजनल संस्कृत टैक्स्ट्स, खंड 1 में संग्रहीत किया है।