7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 224

ब्राह्मणवाद की विजय 209

भी युद्ध हुए कि कौन किसका पहले अभिवादन करे और कौन किसके जाने के लिए रास्ता दे। ये युद्ध सत्ता, पद और प्रतिष्ठा के लिए लड़े गए युद्ध ख्1, थे।

इन युद्धों का परिणाम औरों के लिए तो नहीं, बल्कि ब्राह्मणों के लिए तो बिल्कुल स्पष्ट था। उन्होंने बड़ी-बड़ी गर्वोक्तियां कीं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें यह अनुभव हो गया था कि क्षत्रियों का दमन करना उनके लिए असंभव है और क्षत्रियों का समूल नष्ट करने के लिए किए गए युद्धों के बावजूद ब्राह्मणों को कष्ट देने के लिए वे काफी संख्या में अभी भी बच रहे हैं। हमें ब्राह्मणों द्वारा कही गई इस अश्लील कहानी पर ध्यान देने की कोई आवश्यकता नहीं और जिसे मनु के नाम से जोड़ दिया जाता है कि मनु के युग में क्षत्रियों की नई पीढ़ी उन लोगों की थी, जो परशुराम के द्वारा क्षत्रियों का संहार करने के बाद उनकी विधवाओं से ब्राह्मणों द्वारा पैदा हुए थे। किसी के चरित्र के बारे में मनगढ़त कहानियां बनाना और उन्हें डराकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना एक ऐसा साधन है जिसका उपयोग करने में ब्राह्मणों द्वारा पैदा हुए थे। किसी के चरित्र के बारे में मनगंढ़त कहानियां बनाना और उन्हें डराकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना एक ऐसा साधन है जिसका उपयोग करने में ब्राह्मणों को कभी भी संकोच नहीं हुआ। क्षत्रियों के विरुद्ध ब्राह्मणों की लड़ाई शुरू से ही एक मूर्ख व्यक्ति और एक धौंस जमाने वाले व्यक्ति के बीच की लड़ाई रही। ब्राह्मण चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को स्थापित करने के लिए क्षत्रियों के विरुद्ध लड़ रहे थे लेकिन यही चातुर्वर्ण्य व्यवस्था है, जिसने क्षत्रियों के लिए अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए और ब्राह्मणों के लिए इन्हें वर्जित रखा। इस सिद्धांत के अधीन ब्राह्मण सफलता की किस आशा में क्षत्रियों के विरुद्ध लड़ सकते थे? इस सच्चाई को पहचानने में ब्राह्मणों को अधिक समय नहीं लगना चाहिए था, जो टैलीरेंड ने नेपोलियन को बताई थी कि अस्त्र-शस्त्र देना तो सरल है, लेकिन उनको लेकर चुप बैठना बहुत ही कठिन है और यह कि चूंकि क्षत्रियों के पास अस्त्र-शस्त्र थे और ब्राह्मणों के पास नहीं थे, इसलिए क्षत्रियों के विरुद्ध युद्ध मौत के मुंह में जाना था। ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच इन युद्धों का प्रत्यक्ष परिणाम हुआ। लेकिन कुछ अन्य भी थे, जो ब्राह्मणों की दृष्टि से ओझल नहीं हो सके। जब ब्राह्मण और क्षत्रिय आपस में लड़ रहे थे, वैश्यों और शूद्रों पर रोकथाम रखने व उन्हें नियंत्रण में रखने वाला कोई नहीं बचा था। वे लोग सामाजिक समता की ओर बढ़ रहे थे और ब्राह्मणों और क्षत्रियों के स्तर को लगभग छू रहे थे। क्षत्रियों को परास्त करना ब्राह्मणों के लिए बहुत कठिन था और इस बात का खतरा बहुत ज्यादा था और वास्तविक भी था कि वैश्य और शूद्र उनसे आगे निकल जाएं। क्या ब्राह्मण क्षत्रियों के विरुद्ध लड़ाई जारी रखता और वैश्यों और शूद्रों के

खतरे की उपेक्षा करता रहता? या क्या ब्राह्मण क्षत्रियों के विरुद्ध संघर्ष को, जिसमें सफलता मिलने की कोई आशा नहीं थी, छोड़ उनसे मैत्री करता और उनसे मिलकर वैश्यों और शूद्रों के बढ़ते हुए खतरे को खत्म करने के लिए मिला-जुला मोर्चा बनाता? क्षत्रियों के विरुद्ध

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