7. ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म - Page 225

210 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

युद्धों में जब ब्राह्मण थक गया, तब उसने दूसरा विकल्प चुना। उसने अपने पराक्रमी शत्रु क्षत्रियों के साथ नए आदर्श, अर्थात् अपने और क्षत्रियों के बाल वाले वर्णों और शूद्रों को गुलाम बनाने व उनका शोषण करने के लिए मैत्री करने का प्रयत्न किया। यह नया आदर्श उस समय तक स्वीकृत हो चुका था, जब शतपथ ब्राह्मण की रचना हो रही थी। शतपथ ब्राह्मण में हमें इसलिए आदर्श का वर्णन मिलता है और यह पूर्ण प्रतिष्ठित हो चुका था। यह आदर्श इतना प्रभावपूर्ण है कि मैं उसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत करना चाहता हूं। शतपथ1 का लेखक लिखता हैः

फ्तब उन्होंने पशुओं को (आह्वानीय2) वापस भेज दिया, पहले बकरा जाता है, फिर गधा और अंत में घोड़ा। अब यहां (आह्वानीय) के पास से वापस आते समय घोड़ा पहले, तब गधा और फिर बकरा जाता है µ घोड़ा/क्षात्र (सामन्त वर्ग) का प्रतीक है। गधाµवैश्य और शूद्र का, और बकराµब्राह्मण का प्रतीक है और चूंकि यहां से जाते समय घोड़ा पहले जाता है, इसलिए क्षत्रिय पहले जाता है, उसके बाद तीन अन्य जातियां, और चूंकि वहां से वापस आते समय, बकरा पहले आता है, इसलिए ब्राह्मण पहले आता है और उसके बाद तीन अन्य जातियां। और चूंकि गधा पहले नहीं जाता, चाहे यहां से वापस जाते समय या वहां से वापस आते समय हो, इसलिए ब्राह्मण और क्षत्रिय कभी भी वैश्य और शूद्र के पीछे नहीं जाते। वे क्रम चलते हैं, जिससे अच्छे और बुरे में भ्रांति न हो। इस प्रकार वह उन दोनों जातियों (वैश्य और शूद्र) को पुरोहित और सामंत वर्ग से घेरे रखता है और उन्हें (अर्थात् दोनों जातियों को) निरीह बनाए रखता है।य्

क्षत्रियों के प्रति मनु के विस्मयजनक दृष्टिकोण का यहां समाधान हो जाता है। वह क्षत्रियों को अधीन बनाना चाहता है, लेकिन उनके विरुद्ध खुलकर युद्ध करने से डरता है। वह उन पर शासन करना चाहता है, लेकिन मित्र बनाना ज्यादा अच्छा अनुभव करता है।

इन युद्धों और संधियों ने मनु को यह शिक्षा दी कि ब्राह्मणों का आधिपत्य स्वीकार करने के लिए क्षत्रियों को बल से अधीन बनाने की कोशिश करने से कोई लाभ नहीं होगा। यही एक आदर्श हो सकता है, जिसे सामने रखना होगा। लेकिन व्यवहार की राजनीति में यह एक असंभव आदर्श था। बिस्मार्क की तरह मनु जानता था कि राजनीति ऐसा खेल है जिसमें सब कुछ संभव हो जाता है। संभव यही था कि ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच वैश्य और शूद्रों के विरुद्ध एक आम मुद्दा और एक आम मोर्चा बनाया जाए और यही मनु ने किया। यहां दुःख इस बात पर है कि यह धर्म के नाम पर किया गया लेकिन जिस किसी ने ब्राह्मणवाद को अच्छी तरह समझ लिया है, उसे इससे दुःखी होने की कोई बात नहीं। ब्राह्मणवाद के लिए धर्म, एक आवरण है जिसकी आड़ में वे लोभ और स्वार्थ की राजनीति करते आए हैं।

  1. इगलिंग, शतपथ ब्राह्मण, भाग 3, 226-27

  2. आह्वानीय