हिंदू समाज के आचार-विचार
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आधुनिक युग में ही धर्म और नैतिकता के बीच भेद किया जाने लगा है। धर्म और नैतिकता का एक-दूसरे के साथ इतना घनिष्ठ संबंध है कि दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। सदाचार और नैतिकता तो व्यवहार का विषय है। प्रो. जैक्स ख्1, का जोर देकर कहना है कि नैतिकता की समस्या यही नहीं है कि लोग अच्छाई को समझें, बल्कि यह है कि लोग अच्छे रहें। यही नहीं कि जो उचित है, उसे वैज्ञानिक आधार दिया जाए, बल्कि यह है कि जो उचित है, वह किया भी जाए। जो अच्छा है और जो उचित है, उसकी परिभाषा करना ही सदाचार है। प्रो. जैक्स ठीक ही कहते हैंः
फ्जब कभी हम सदाचार का अध्ययन उसके व्यवहार पक्ष की अनदेखी कर
करते हैं, तब मुझे यही लगता है कि हम जो कुछ अध्ययन कर रहे हैं, वह सदाचार
नहीं है। जब तक हम व्यवहार के क्षेत्र में नहीं जा पहुंचते, तब तक सदाचार का
प्रश्न ही नहीं होता। संसार में सदाचार विषयक किसी भी सिद्धांत को शुरू करने
से उसका प्रभाव तब तक कुछ भी नहीं होता, जब तक उसका व्यवहार करने के
लिए उसके पीछे कोई प्रबल प्रेरणा नहीं हो। अच्छा जीवन, जैसा कि अरिस्टाटल ने
कहा है, एक बड़ा ही कठिन कार्य है। यह तब भी एक कठिन कार्य है, जब हम
मौजूदा नियमों के अनुसार ही जीवन यापन करते हों। लेकिन जब अच्छे जीवन के
लिए यह आवश्यक हो जाता है कि मौजूदा मानकों को लांघकर जीवन यापन किया
जाए, तब मुक्ति की अदम्य शक्ति के बिना यह कैसे हो सकता है?य्
गलत काम करने की मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति पर सिर्फ इस जानकारी का कोई
प्रभाव नहीं पड़ता कि मनुष्य को सही काम क्यों करना चाहिए - यह उन कठिनाइयों
का समाधान नहीं है जो अच्छे जीवन के रास्ते में आती हैं।
जब तक कोई प्रेरक शक्ति सदाचार के साथ नहीं रहती, तब तक सदाचार निष्क्रिय रहता है। जो वस्तु सदाचार को प्रेरक शक्ति देती है, वह निस्संदेह धर्म है। यह ऊर्जा है जो प्रो. जैक्स के शब्दों मेंµ
फ्प्रेरणाओं का सृजन करती है। ये प्रेरणाएं इतनी सबल होती हैं कि उनसे अच्छा
जीवन व्यतीत करने के मार्ग में आने वाली बड़ी-बड़ी दिक्कतें दूर हो जाती हैं चाहे
वे देखने में सरल ही क्यों न हों, और ये इतनी पर्याप्त होती हैं कि जिनसे नैतिक
आदर्श में निरंतर सुधार की प्रक्रिया जारी रहती है।य्
प्रेरक बल के रूप में धर्म विभिन्न प्रकार से सदाचार की इच्छा को प्रबल बनाता है। कभी वह निषेध के रूप में होता है जिसके अधीन मृत्यु के बाद पुरस्कार या दंड का विधान होता है, कभी प्रभु के संदेश के बतौर यह सदाचार नियमों का निर्माण करता
- मोरल्स एंड रिलिजन-हिब्बर्ट जर्नल, खंड 19, पृ. 615-21