214 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है, कभी इन नियमों में पवित्रता का भाव भर देता है कि लोग स्वतः इनका पालन करें। लेकिन ये सब केवल विभिन्न रूप हैं, जिनमें धर्म के द्वारा पैदा की गई प्रेरणा शक्ति व्यवहार में सदाचार की भावना बनाए रखती है। धर्म ऊर्जा है, जो सदाचार के चक्र को घुमाती है।
अगर नैतिकता और सदाचार कर्तव्य हैं, तब निस्संदेह मनुस्मृति नीतिशास्त्र का ग्रंथ है। जो मनुस्मृति को पढ़ने का कष्ट करेगा, वह यह स्वीकार करेगा कि इस ग्रंथ में अगर कोई विषय प्रधान है, तो वह कर्तव्यों का है। मनु सर्वप्रथम वह व्यक्ति था जिसने उन कर्तव्यों को व्यवस्थित और संहिताबद्ध किया, जिन पर आचरण करने के लिए हिंदू बाध्य थे। वह वर्णाश्रम धर्म और साधारण धर्म में भेद करता है। वर्णाश्रम धर्म विशिष्ट कर्तव्य हैं जिनका संबंध मनुष्य के जीवन में उसकी अवस्था से है। यह अवस्था उसके वर्ण या जाति और उसके आश्रम अथवा जीवन की विशिष्ट स्थिति से निर्धारित होती है। साधारण धर्म वे कर्तव्य हैं जिन्हें आयु, जाति या मत से प्रभावित किसी विशेष समुदाय या सामाजिक वर्ग या जीवन की किसी विशेष अवस्था या आयु का होने के कारण नहीं, वरन मनुष्य होने के नाते करने चाहिए। इस संपूर्ण ग्रंथ में कर्तव्यों के अतिरिक्त किसी और विषय की विवेचना नहीं है।
इस प्रकार मनुस्मृति कानून का ग्रंथ है, जिसमें धर्म और सदाचार को एक में मिला दिया गया है। चूंकि इसमें मनुष्य के कर्तव्य की विवेचना है, इसलिए यह आचार-शास्त्र का ग्रंथ है। चूंकि इसमें जाति का विवेचन है जो हिंदू धर्म की आत्मा है, इसलिए यह धर्म ग्रंथ है। चूंकि इसमें कर्तव्य न करने पर दंड की व्यवस्था की गई, इसलिए यह कानून है। इसे ध्यान में रखते हुए अगर हम हिंदुओं के आचार-विचार के आदर्शों और उनकी धार्मिक संकल्पनाओं को जानने के लिए मनुस्मृति का सहारा लें, तब कोई गलत बात नहीं होगी।
यह कहना कि मनुस्मृति एक धर्मग्रंथ है, बहुत कुछ अटपटा लगता है। इसका कारण यह है कि हिंदू धर्म बहुत ही भ्रामक शब्द है। विभिन्न लेखकों ने इसकी परिभाषा विभिन्न प्रकार से की है।
सर डी. इबटसन ख्1, हिंदू धर्म की परिभाषा इस प्रकार करते हैंः
फ्वंशानुगत पुरोहितों का धर्म जो ब्राह्मणों द्वारा संपन्न होता है, जो जाति नामक
सामाजिक संस्था से शक्ति ग्रहण करता है और जो भारत में जन्मे धर्म के सभी पक्षों
और विविधताओं को अपने में समेटे हुए है, जो विदेशों से आए ईसाई और इस्लाम
- पंजाब सेन्सस रिपोर्ट (1881), पैरा 214