220 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
10.81. लेकिन यदि ब्राह्मण अपने इस व्यवसाय से जिसका अभी उल्लेख किया गया है, जीवन-निर्वाह नहीं कर सके, तब क्षत्रिय के लिए निर्दिष्ट व्यवसाय को अपना कर जीवन-निर्वाह करे क्योंकि वह पद के अनुसार उसके बाद आता है।
10.82. यदि यह पूछा जाए, ‘अगर वह इन दोनों व्यवसायों में से किसी भी एक व्यवसाय से अपना जीवन-निर्वाह नहीं कर सके तब क्या किया जाए’ उत्तर है, वह वैश्य की जीवन-पद्धति अपना ले, स्वयं खेती करे और पशु-पालन करे।
10.83. परंतु जो ब्राह्मण और क्षत्रिय वैश्य की जीवन-पद्धति के अनुसार जीवन यापन करता है, उसे कृषि (व्यवसाय) कर्म करना चाहिए। कृषि के बारे में हमेशा सतर्क रहना चाहिए (जिसमें) अनेक जीवों की हिंसा होती है और जो दूसरों, जैसे बैल आदि पर निर्भर करता है। अतः इससे यथासंभव बचना चाहिए और पशुपालन करना चाहिए।
10.84. कुछ लोग कृषि (खेती) को उत्तम कार्य कहते हैं किंतु परोपकारी व्यक्ति जीविका के इस साधन को हेय कहते हैं (क्योंकि) लोहे के मुख (फार) लगा लकड़ी का उपकरण भूमि और उसमें रहने वाले जीवों को क्षति पहुंचाता है।
10.85. लेकिन जो व्यक्ति जीविका के उत्तम साधनों के अभाव में उचित व्यवसायों को नहीं अपना सकता, वह उन वस्तुओं की बिक्री कर धन अर्जित कर सकता है जो व्यापारी बेचते हैं, लेकिन इनमें निम्नलिखित वस्तुओं को शामिल न करे।
10.86. उन्हें सभी तरह का द्रव पदार्थ, पका अन्न, तिल के बीज, पत्थर, नमक-पशु और मनुष्य (दास-दासी) को बेचने का व्यापार नहीं करना चाहिए।
10.87. उन्हें बुना हुआ लाल रंग में रंगा कपड़ा, सनई से बना कपड़ा और छाल, ऊन (चाहे वह लाल रंग की न हो), फल, कंद और औषधि में काम आने वाले पेड़ पौधे (बेचने का व्यापार नहीं करना चाहिए)।
10.88. जल, लोहा, विष, मांस, सोम नाम की बेल, सभी तरह के इत्र, दूध, मधु, दही, घी, तिल का तेल, मोम, गुड़ और कुश का उन्हें व्यापार नहीं करना चाहिए।
10.89. सभी प्रकार के जंगली जंतु जैसे मृग आदि, भूख से व्याकुल जंगली जीव, पक्षी और मछली, मदिरा, नील, लाख और खुर वाले जानवर, इनका व्यापार नहीं करना चाहिए।
10.90. लेकिन ब्राह्मण किसान स्वेच्छापूर्वक तिल के बीज धार्मिक कृत्यों के लिए बेच सकता है जिसे यदि वह लाभ अर्जित करने की आशा से बहुत दिनों तक अपने पास न रखना चाहे और जिसे उसने स्वयं पैदा किया हो।