8. हिंदू समाज के आचार-विचार - Page 236

हिंदू समाज के आचार-विचार

221

10.91. यदि वह खाने, मलने और दान देने के अतिरिक्त तिलों का उपयोग किसी अन्य कार्य में करता है, तब वह अपने पितरों के सहित कीड़ा होकर कुत्ते की विष्ठा में गिरता है।

10.92. मांस, लाख या नमक बेचने से ब्राह्मण तत्काल पतित हो जाता है और लगातार तीन दिन दूध बेचने से वह शूद्र हो जाता है।

10.93. अन्य निषिद्ध वस्तुएं स्वेच्छापूर्वक बेचने से वह ब्राह्मण सात रात्रि में वैश्यत्व को प्राप्त होता है।

10.94. द्रव पदार्थ के बदले द्रव पदार्थ लेना-देना चाहिए, लेकिन नमक के बदले द्रव पदार्थ का लेन-देन नहीं करना चाहिए। पके अन्न के बदले पके अन्न, तिल के बदले धान का बराबर-बराबर लेन-देन करना चाहिए।

10.102. विपत्ति में पड़ने पर ब्राह्मण किसी भी व्यक्ति से दान ग्रहण कर सकता है क्योंकि कोई भी ऐसा धार्मिक नियम नहीं है जिसके आधार पर शुद्धता अशुद्ध घोषित की जा सके।

10.103. अनधिकारियों को वेदाध्ययन कराने, यज्ञ कराने या उनसे दान लेने से जो सामान्यतः अनुमोदित नहीं है, विपत्ति में पड़े ब्राह्मणों को कोई दोष नहीं होता क्योंकि वे अग्नि और जल के समान पवित्र हैं।

इसकी तुलना उस व्यवस्था से कीजिए जो मनु ने अन्य वर्गों के लिए विपत्ति पड़ने पर निर्धारित की है। मनु कहता हैः

10.96. नीच वर्ग का जो मनुष्य अपने से ऊंचे वर्ग के मनुष्य की वृत्ति को लोभवश ग्रहण कर जीविका-यापन करे तो राजा उसकी सब संपत्ति छीनकर उसे तत्काल निष्कासित कर दे।

10.97. अपना धर्म, चाहे वह त्रुटिपूर्ण रीति से ही क्यों न पूरा किया जाए, दूसरे धर्म से श्रेष्ठ है जो चाहे कितनी ही पूर्ण रीति से क्यों न किया जाए क्योंकि जो व्यक्ति बिना किसी आवश्यकता के दूसरे वर्ण के धर्म का निर्वाह करता है, वह अपने धर्म से भी च्युत हो जाता है।

10.98. अपने धर्म (कार्यों) से जीवन निर्वाह न कर सकने वाला वैश्य यह विचार न कर कि क्या किया जाना चाहिए, शूद्र द्वारा करणीय धर्म (कार्य) कर सकता है, लेकिन जब वह समर्थ हो जाए तब उसे उस धर्म (कार्य) से निवृत्त हो जाना चाहिए।