222 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
10.99. द्विजों की सेवा करने की अभिलाषा वाले चतुर्थ वर्ग के व्यक्ति को यदि जीविका न मिले और उसकी पत्नी, पुत्र आदि भूख से पीडि़त हों, दस्तकारी से जीविका अर्जित करनी चाहिए।
10.121. यदि कोई शूद्र जीविका उपार्जन करना चाहता है और ब्राह्मण की सेवा नहीं कर सकता, तब वह क्षत्रिय की सेवा करे या यदि यह क्षत्रिय की अपने जन्म के कारण सेवा नहीं कर सकता, तब वह धनी वैश्य की सेवा कर अपनी जीविका का उपार्जन करे।
10.122. जो व्यक्ति ब्राह्मण की सेवा स्वर्ग प्राप्ति की कामना से या स्वयं अपनी जीविका, दोनों की अभिलाषा से करता है, तब उस ब्राह्मण का नाम उसके नाम के साथ जुड़ने से उसे निश्चित सफलता मिलती है।
10.123. ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्रों का मुख्य कर्म कहा गया है, इसके अतिरिक्त वह शूद्र जो कुछ करता है, उसका कर्म निष्फल होता है।
10.124. ब्राह्मणों को चाहिए कि वे अपनी सेवा करने वाले शूद्र के लिए उसके काम करने की शक्ति, उत्साह और परिवार के निर्वाह के प्रमाण के अनुसार उसकी जीविका निश्चित करें।
10.125. जो कुछ पका धान्य बच जाए, वह उसे (शूद्र को) दिया जाए, जो वस्त्र उन्होंने पहन लिए हों, वे उसे दिए जाएं और उसे पुआल और खाट आदि दिया जाए।
10.126. लहसुन, प्याज आदि अन्य वर्जित सब्जी खाने से शूद्र को कोई पातक (दोष) नहीं होता, उसका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं होना चाहिए, उसे धर्म-कार्य करने का अधिकार नहीं है, लेकिन अगर वह यज्ञ में पका हुआ अन्न धर्म-कार्य स्वरूप अर्पित करता है तो कोई निषेध नहीं है।
10.127. जो शूद्र अपने सारे कर्तव्य करने के इच्छुक हैं और यह जानते हुए कि उन्हें क्या करना चाहिए, अपने गृहस्थ-जीवन में अच्छे मनुष्यों की तरह आचरण करते हैं और स्तुति व प्रार्थना के अतिरिक्त और कोई धार्मिक पाठ नहीं करते और पातक कर्म-रहित हैं, वे प्रशंसित होते हैं।
10.128. दूसरों की निंदा न कर जो शूद्र द्विज के आचरण के अनुकूल आचरण करता है, वह इतना करने से ही अनिंदित हो, इस लोक में और अगले लोक में प्रशंसित होता है।