हिंदू समाज के आचार-विचार
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10.129. किसी भी शूद्र को संपत्ति का संग्रह नहीं करना चाहिए, चाहे वह इसके लिए कितना ही समर्थ क्यों न हो, क्योंकि जो शूद्र धन का संग्रह कर लेता है उसे उसका मद हो जाता है और वह अपने उद्धत या उपेक्षापूर्ण व्यवहार से ब्राह्मणों को कष्ट पहुंचाता है।
अंत में मनु कहता हैः
10.130. विपत्ति पड़ने पर जीविकोपार्जन के संबंध में चारों वर्णों के ये कर्तव्य हैं, जिन्हें विस्तार से कहा गया है और अगर ये वर्ण इन कर्तव्यों को सम्यक रीति से पूरा करें तब उन्हें श्रेष्ठ गति प्राप्त होगी।
कुछ के लिए ये विशेषाधिकार केवल सामाजिक नहीं थे, बल्कि वे आर्थिक भी थेः 8.35. जो व्यक्ति सच-सच यह कह देगा कि ‘यह संपत्ति जो मैंने अपने पास रखी है’ मेरी है, तो राजा उससे उस संपत्ति को प्राप्त करने के लिए उस संपत्ति का छठा या बारहवां भाग लेगा।
8.36. लेकिन जो व्यक्ति ऐसा झूठ-मूठ कहे, उस पर उसकी अपनी संपत्ति का अष्टमांश या जिस संपत्ति के बारे में झूठ-मूठ का दावा किया गया है, उसके मूल्य का कुछ भाग, जो न्यायोचित हो, जुर्माना किया जाए।
8.37. जिस किसी विद्वान ब्राह्मण को कहीं छिपाकर रखी गई संपत्ति प्राप्त होती है, वह उस सारी संपत्ति को ग्रहण कर ले क्योंकि वह सबका स्वामी है। 8.38. किंतु जो निधि प्राचीन-काल से भूमि में गड़ी राजा या किसी अन्य प्रजाजन द्वारा खोज निकाली जाए तब राजा उस निधि का अर्द्धांश ब्राह्मणों में वितरित करने के बाद शेष अर्द्धांश अपने कोष में रख ले।
9.323. लेकिन जिस राजा का अंत किसी असाध्य रोग के कारण निकट है, वह अपनी समस्त संग्रहीत संपत्ति और अपना राज्य अपने पुत्र को दे देगा और युद्ध में और युद्ध न हो, तब भोजन का त्याग कर अपनी मृत्यु का वरण करेगा। 7.127. खरीद और बिक्री की दरों, मार्ग की दूरी, भोजन और मिर्च, मसाले आदि का व्यय, माल लाने पर व्यय, व्यापार में शुद्ध लाभ का पता लगाकर राजा व्यापारियों से बेचने योग्य वस्तुओं पर कर देने के लिए कहे।
7.128. राजा अपने राज्य में उन करों को निरंतर लगाए जिनसे उसे और व्यापारी को विभिन्न कार्यों के लिए व्यय की उचित प्रतिपूर्ति हो सके। 7.129. जिस प्रकार जोंक, बछड़ा और मधुमक्खी अपना-अपना खाद्य थोड़ा-थोड़ा ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार राजा को प्रजा से वार्षिक कर लेना चाहिए।