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हिंदू समाज के आचार-विचार

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9.187. मृत व्यक्ति का निकटतम सपिंड जो, चाहे पुरुष हो या स्त्री, उसके बाद तीसरी पीढ़ी तक उसका उत्तराधिकारी होता है, सपिंड या उनकी संतान के न होने पर समानोदक (सजातीय) या दूर का संबंधी उत्तराधिकारी होता है, या आचार्य, शिष्य या साथ पढ़ा व्यक्ति मृत व्यक्ति का उत्तराधिकारी होता है।

9.188. इन सबके न होने पर तीनों वेदों में निष्णात ब्राह्मण जो शरीर और मन से शुद्ध हो, जिसके सब राग-द्वेष शांत हों, वे ही मृत व्यक्ति के कानूनी उत्तराधिक­ ारी होते हैं, उन्हीं को ही पिंडदान करना चाहिए। इस प्रकार मृत व्यक्ति के लिए पिंडदान आदि की क्रिया विफल नहीं हो सकती।

9.189. ब्राह्मण की संपत्ति द्वारा राजा द्वारा कभी भी नहीं ली जानी चाहिए, यह एक निश्चित नियम है, मर्यादा है। लेकिन अन्य जाति के व्यक्तियों की संपत्ति उनके उत्तराधिकारियों के न रहने पर राजा ले सकता है।

विभिन्न वर्गों को अपने सामाजिक जीवन का किस प्रकार निर्वाह करना चाहिए, इसकी मनु ने कुछ नियमों में व्याख्या की है। ये नियम हिंदुओं के नैतिक सिद्धांत के महत्वपूर्ण अंग हैं।

मनु निर्देश देता हैः

10.3. जाति की विशिष्टता से, उत्पत्ति-स्थान की श्रेष्ठता से, अध्ययन एवं व्याख्यान आदि द्वारा नियम के धारण करने से और यज्ञोपवीत संस्कार आदि की श्रेष्ठता से ब्राह्मण ही सब वर्णों का स्वामी है।

9.317. जिस प्रकार शास्त्र विधि से स्थापित अग्नि और सामान्य अग्नि, दोनों ही श्रेष्ठ देवता हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण चाहे वह मूर्ख हो या विद्वान, दोनों ही रूपों में श्रेष्ठ देवता है।

9.319. इस प्रकार ब्राह्मण यद्यपि निंदित कर्मों में प्रवृत्त होते हैं, तथापि ब्राह्मण सब प्रकार से पूज्य हैं, क्योंकि वे श्रेष्ठ देवता हैं।

7.35. राजा का सृजन इन सभी वर्णों और आश्रमों की रक्षा के लिए किया गया है जो शुरू से लेकर अंत तक अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।

7.36. मैं क्रमानुसार उन सब कर्तव्यों के बारे में तुमसे कहूंगा जो शास्त्रानुसार राजा के द्वारा अपनी प्रजा की रक्षा के लिए अपने अमात्यों की सहायता से अवश्य किए जाने चाहिएं।

7.37. राजा प्रातःकाल उठकर ऋग्यजुःसाम के ज्ञाता और विद्वान (राजधर्म में) ब्राह्मणों की सेवा करे और उनके कहने के अनुसार कार्य करे।