226 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
7.38. वह ब्राह्मणों का हमेशा आदर-सत्कार करे जो आयु और धर्म, दोनों दृष्टियों से वरिष्ठ हैं, जो वेदों के ज्ञाता हैं, जो काया और चित्त से शुद्ध हैं क्योंकि जो वरिष्ठ का आदर करता है, वह राक्षसों द्वारा भी हमेशा पूजित होता है। 9.313. राजा को घोरतम विपत्ति में भी ब्राह्मणों को कु्रद्ध होने के लिए उत्तेजित नहीं करना चाहिए, क्योंकि ब्राह्मण क्रोधित होने पर उस राजा को, उसकी सेना, हाथियों, घोड़ा, वाहनों को नष्ट कर सकते हैं।
ऐसे थे राजनीतिक जीवन में विविध संबंध। विभिन्न वर्णों में सामान्य सामाजिक संबंधों के बारे में मनु ने निम्नलिखित नियम निर्धारित किए हैंः
3.68. गृहस्थ के यहां वध के पांच स्थान होते हैं जहां छोटे जीवों की हत्या हो सकती हैः चूल्हा, चक्की, झाडू, ओखली, मूसल और जल का घट। उन्हें व्यवहृत करता हुआ वह पाप का भागी होता है।
3.69. इन क्रमिक स्थानों पर अज्ञानवश किए गए पापों से निवृत्ति के लिए महर्षियों ने पांच महायज्ञ प्रतिदिन करने का विधान गृहस्थों के लिए बताया है। 3.70. शास्त्रों का अध्यापन और अध्ययन ‘ब्रह्मयज्ञ’ है, पिंड और जल तर्पन करना ‘पितृयज्ञ’। हवन करना ‘देवयज्ञ’ है, बलिवैश्वदेव करना ‘भूतयज्ञ’ है तथा अतिथियों का भोजन आदि से सत्कार करना ‘नृयज्ञ’ है।
3.71. यथाशक्ति इन पांच महायज्ञों को नहीं छोड़ने वाला व्यक्ति गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी (पांचों पापों) के दोषों से मुक्त रहता है।
3.84. ब्राह्मण अपनी गृह-अग्नि में सभी देवों के लिए पकाए गए अन्न को विधिपूर्वक निम्नलिखित देवताओं को अर्पित करे।
यह अन्न जब देवताओं को अर्पित कर दिया जाए, तब उसके बाद की प्रक्रिया के बारे में मनु निर्देश देता हैः
3.92. वह कुत्तों, जाति से बहिष्कृतों, चांडालों, पापजन्य रोग से ग्रस्त व्यक्तियों, कौओं, कीड़ा-मकोड़ों का अंश धीरे-धीरे पृथ्वी पर रख दे।
आतिथ्य संबंधी नियमों के बारे में मनु गृहस्थ को निर्देश देता हैः 3.102. एक रात ठहरने वाला व्यक्ति अतिथि कहा जाता है, क्योंकि इतने थोड़े समय के लिए रहने से पूरी तिथि, अर्थात् चंद्रमा के दिन के लिए भी नहीं ठहरता। 3.98. क्योंकि ब्राह्मण के मुख में स्थित अग्नि अर्पित करने से दाता विपत्ति और अन्य भयंकर पाप से मुक्त हो जाता है, ब्राह्मण का मुख ज्ञान और पुण्य से दीप्त रहता है।