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हिंदू समाज के आचार-विचार

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3.107. श्रेष्ठ अतिथियों को श्रेष्ठ रूप में, निम्न को निम्न रूप में, समान को समान रूप में आसन, शैया आदि और तदनुसार जब तक वे रहें, तब तक सत्कार और आदर दिया जाए।

3.110. ब्राह्मण के घर आए हुए क्षत्रिय, वश्ैय या शूद्र, परिचित मित्र या बांधव और गुरु ‘अतिथि’ नहीं कहे जाते।

3.111. यदि क्षत्रिय अतिथि धर्म से ब्राह्मण के घर आ जाए तब पूर्वोक्त ब्राह्मण अतिथियों को भोजन कराने के बाद उसे उसकी इच्छा के अनुसार भोजन कराया जाए।

3.112. अतिथि के रूप में वैश्य या शूद्र के आने पर वह उस पर दया प्रदर्शित करता हुआ अपने नौकरों के साथ भोज कराए।

समाज में एक वर्ण की अपेक्षा दूसरे वर्ण की स्थिति कैसी होगी, इस बारे में मनु ने जो नियम बनाए हैं, वे कम रोचक नहीं हैं। वह सामाजिक स्थिति के बारे में एक समीकरण बताता हैः

2.135. विद्यार्थी ब्राह्मण को, जो चाहे दस वर्ष का ही क्यों न हो और क्षत्रिय को, जो चाहे एक सौ वर्ष की आयु का हो, पिता और पुत्र के रूप में समझे, इन दोनों में युवा ब्राह्मण को पिता समझकर आदर दे।

2.136. धन-सम्पत्ति, बंधु, आयु, नैतिक आचार और पांचवे आध्यात्मिक ज्ञान के कारण मनुष्यों को आदर मिलता है, लेकिन इनमें जिसका उल्लेख सबसे अंत में हुआ है, वह सबसे अधिक पूजनीय है।

2.137. तीन उच्च वर्गों में जिस किसी भी व्यक्ति के पास उक्त पांच गुणों में संख्या और मात्रा की दृष्टि से अधिक गुण हों, वह व्यक्ति अधिक पूजनीय है, शूद्र भी यदि वह अपनी आयु के नवें दशक में प्रवेश कर रहा हो।

2.138. जो व्यक्ति किसी गाड़ी में बैठकर जा रहा हो, जो नब्बे वर्ष से अधिक आयु का हो, जो रोगग्रस्त हो, जो बोझ लेकर जा रहा हो, स्त्री को, जो स्नातक अपने गुरु के पास से आ रहा हो, राजकुमार और वर के लिए, रास्ता छोड़ देना चाहिए।

2.139. अगर कोई ऐसा अवसर आए कि बहुत से लोगों से एक साथ मिलना हो तब जो स्नातक हाल में घर वापस लौटा है, वह और राजकुमार, इन दोनों में से राजकुमार की अपेक्षा स्नातक को अधिक आदर देना चाहिए।