228 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सामाजिक स्थिति के नियमों को अधिक स्पष्ट करने के लिए अभिवादन से संबंधित नियम यहां उद्धृत हैंः
2.121. जो युवक स्वभाववश वृद्ध जनों को प्रणाम करता और निरंतर उनकी सेवा करता है, उसे अपनी चार वस्तुओं में वृद्धि प्राप्त होती है - आयु, ज्ञान, यश और बल।
2.122. ब्राह्मण वृद्ध जनों को अपना नाम बताते हुए प्रणाम करें। 2.123. जो व्यक्ति संस्कृत भाषा का ज्ञान न होने के कारण अपने नाम का अर्थ नहीं जानते, उनसे विद्वान व्यक्ति यह कहे, ‘यह मैं हूं’ और आपको नमस्कार करता हूं, वह इसी प्रकार स्त्रियों का अभिवादन करे।
2.124. अभिवादन में अपने नाम के बाद संबोधन सूचक अव्यय ‘भोः’ का उच्चारण करे, क्योंकि ऋषियों ने ‘भोः’ शब्द को नामों का पूर्ण उच्चारित स्वरूप कहा है।
2.125. अभिवादन का उत्तर देते हुए ब्राह्मण से ‘हे सौम्य! आयुष्मान हो’ कहे तथा उसके नाम के अंतिम अक्षर के पूर्व वाले अकार स्वर का प्लुतोच्चारण करे। 2.126. जो ब्राह्मण अभिवादन के बाद प्रत्याभिवादन करना नहीं जानता, विद्वान ब्राह्मण उसका अभिवादन न करे, क्योंकि जैसा शूद्र है वैसा ही वह भी है। 2.127. किसी विद्वान व्यक्ति को कोई ब्राह्मण मिले तब उससे कुशल, क्षत्रिय मिले तब उसके अनामय, वैश्य मिले तब क्षेम और जब कोई शूद्र मिले तब उसके आरोग्य होने के बारे में पूछे।
मनु ने धर्म और धार्मिक संस्कारों और यज्ञकर्म के संबंध में जो व्यवस्थाएं दी हैं, वे उल्लेखनीय हैंः
3.68. गृहस्थ के यहां वध के पांच स्थान होते हैं या जहां छोटे जीवों की हत्या हो सकती हैः चूल्हा, चक्की, झाडू, ओखली, मूसल और जल का घट। उन्हें व्यवहृत करता हुआ वह पाप का भागी होता है।
3.69. इन क्रमिक स्थानों पर अज्ञानवश किए गए पापों से निवृत्ति के लिए महर्षियों ने पांच महायज्ञ प्रतिदिन करने का विधान गृहस्थों के लिए बताया है। 3.70. शास्त्रों का अध्यापन और अध्ययन ‘ब्रह्मयज्ञ’ है, पिंड और जल अर्पित करना ‘पितृयज्ञ’ है, हवन करना ‘देवयज्ञ’ है, बलिवैश्वदेव करना ‘भूतयज्ञ’ है तथा अतिथियों का भोजन आदि से सत्कार करना ‘नृयज्ञ’ है।