हिंदू समाज के आचार-विचार
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3.71. यथाशक्ति इन पांच महायज्ञों को नहीं छोड़ने वाला व्यक्ति गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी पांचों पापों के दोषों से मुक्त रहता है।
इसके बाद मनु यह निर्देश देता है कि सभी को संस्कार-लाभ का अधिकार प्राप्त नहीं है और सभी को यज्ञ-कर्म करने का समान अधिकार नहीं है।
वह संस्कार-कर्म और यज्ञ-कर्म के प्रसंग में स्त्रियों और शूद्रों की स्थिति निर्धारित करता है। स्त्रियों के संबंध में मनु कहता हैः
2.66. उपनयन संस्कार को छोड़कर वही संस्कार स्त्रियों के लिए उतनी ही आयु के प्राप्त होने पर उसी क्रम से किए जाने चाहिए जिससे काया शुद्ध हो सके, लेकिन ये संस्कार बिना वेद मंत्र के किए जाएं।
शूद्रों के संबंध में मनु कहता हैः
10.127. जो शूद्र अपने सारे कर्तव्य करने के इच्छुक हैं और यह जानते हुए कि उन्हें क्या करना चाहिए, अपने गृहस्थ-जीवन में अच्छे मनुष्यों की तरह आचरण करते हैं और स्तुति व प्रार्थना के अतिरिक्त और कोई धार्मिक पाठ नहीं करते और पातक कर्म-रहित हैं, वे प्रशंसित होते हैं।
किसी व्यक्ति को यज्ञोपवीत पहनाना एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार हैः 2.36. ब्राह्मण बालक का गर्भ से आठवें वर्ष, क्षत्रिय बालक का गर्भ से ग्यारहवें वर्ष और वैश्य बालक का गर्भ से बारहवें वर्ष पिता अपने शिशु का अपने वर्ण के अनुसार यह (यज्ञोपवीत) संस्कार कराए।
2.37. वेदाध्ययन और ज्ञानवार्धक्य-प्राप्ति आदि तेज के लिए ब्राह्मण बालक का गर्भ से पांचवें वर्ष में पराक्रम में वृद्धि के लिए, क्षत्रिय बालक का गर्भ से आठवें वर्ष में ‘यज्ञोपवीत’ संस्कार उसके पिता द्वारा कराना चाहिए।
2.38. गायत्री-सहित यज्ञोपवीत संस्कार में विलंब नहीं करना चाहिए, ब्राह्मण के संबंध में सोलह वर्ष तक, क्षत्रिय के संबंध में बाईस वर्ष तक और वैश्य के संबंध में चौबीस वर्ष तक (यह संस्कार हो जाना चाहिए)।
2.39. इसके बाद इन तीनों वर्णों के युवक जिनका उचित समय पर यज्ञोपवीत संस्कार नहीं होता है, व्रात्य या जातिच्युत हो जाते हैं, गायत्री भ्रष्ट हो जाते हैं और शिष्ट जनों से निंदित होते हैं।
जहां एक गायत्री का संबंध है, वह एक मंत्र है। मनु इसके महत्व को स्पष्ट करते हुए कहता हैः