8. हिंदू समाज के आचार-विचार - Page 245

230 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

2.76. ब्रह्मा ने तीन वेदों से तीन अक्षरों को निकाला जो परस्पर मिलकर ओýम बनते हैं, इसके साथ तीन व्याहृतियों ‘भूः भुवः स्वः’ अर्थात् पृथ्वी, आकाश और स्वर्ग को भी निकाला।

2.77. परमेष्ठी, ब्रह्मा ने इन तीनों वेदों से निर्वचनीय पाठ की तीन मात्राओं को भी निकाला, जिसका आरंभ ‘तत्’ से हाता है और जिसे सावित्री या गायत्री कहते हैं।

2.78. जो ब्राह्मण वेद जान लेगा, और इस अक्षर (ऊं) का प्रातःकाल और संध्या-काल दोनों समय मन में उच्चारण करेगा और इस पवित्र अक्षर के बाद तीन शब्दों का उच्चारण करेगा, उसे वेदविहित पुण्य की प्राप्ति होगी।

2.79. जो ब्राह्मण इन तीन (1. प्रणव-¬, 2. व्याहृति ‘भूः, भुवः, स्वः’ और सावित्री-‘तत्’) का प्रतिदिन एक सहÐ बार पाठ करेगा, वह एक मास में बड़े से बड़े पाप से मुक्त हो जाएगा, जैसे सांप अपनी केंचुल से मुक्त हो जाता है।

2.80. जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन अलौकिक शब्दों का पाठ और समय पर की जाने वाली क्रियाएं (अग्निहोत्र आदि) नहीं करेगा, वह पुण्यवानों के बीच निंदित होगा।

2.81. ऊंकार-पूर्विका (जिनके पहले ‘¬’ कार है, ऐसी) ये तीनों महाव्याहृतियां (भूः, भुवः, स्वः) अव्यय और त्रिपदा सावित्री वेद का मुख अथवा मुख्य भाग हैं।

2.82. जो व्यक्ति प्रतिदिन तीन वर्ष तक ‘¬’ कार सहित महाव्याहृतियों का जप करता है, वह वायु और ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।

2.83. तीन अक्षर युक्त एकाक्षर (¬) ब्रह्म का प्रतीक है, ईश्वर का ध्यान कर श्वास रोकना (प्राणायाम) सर्वश्रेष्ठ तप है, लेकिन गायत्री से श्रेष्ठ कोई मंत्र नहीं, मौन की अपेक्षा सत्य भाषण श्रेष्ठ है।

2.84. वेदविहित सभी कर्म, यज्ञ और धार्मिक विधियां अपना-अपना फल देकर नष्ट हो जाती हैं, लेकिन जो नष्ट नहीं होता वह ¬ है, इसीलिए इसे अक्षर कहते हैं, क्योंकि यह परब्रह्म, अर्थात् सृजित जीवों के पालक का प्रतीक है।

2.85. उसके पवित्र नाम का जप विधिविहित यज्ञों से दस गुना श्रेष्ठ है, अगर इसे कोई न सुन सके, तब सौ गुना श्रेष्ठ है और अगर यहेकवल मानस रूप हो तब हजार गुना श्रेष्ठ है।

2.86. चारों घरेलू संस्कारों को जिनमें विधिविहित यज्ञ का विधान है, अगर एक में मिला दिया जाए तब वह गायत्री के जप द्वारा किए गए यज्ञ के सोलहवें भाग के भी बराबर नहीं है।